Sunday, 27 June 2010

आज की सीता

हाँ, मैं आज की सीता की ही बात कर रही हूँ. यह सच है की उस सतयुग की सीता से भी ज्यादा अग्नि-परीक्षायें देती है आज की नारी..एक लड़की के शादी के बंधन की डोर सपनों में बांधकर उसे पति के घर तक कैसे लाती है...लेकिन क्या हर नारी खुश है अपनी शादी से..जो सपने वो आँखों में संजोकर लाती है ख़ुशी से...उन पर तानों व अत्याचार से जो तुषारापात होता है..तो क्या मज़ा आता है वैवाहिक जीवन में ?

किसी ने मुझे ये कमेन्ट भेजा था:
''राम को पुरुषों में उत्तम बनाने के लिए ही सीता को बदनाम होना पड़ा ! क्या यह नहीं माना जा सकता है ? राम का अस्तित्व ही सीता के कारण है ! मुझे लगता है " हर सफल आदमी के पीछे महिला का हाथ होता है " वाली बात का प्रारंभ भी यही से हुआ होगा ! हम अपने घर में हर छोटी बड़ी चीज के लिए घरवाली पर निर्भर रहते है ! ''

तो सवाल उठता है की अगर राम का अस्तित्व सीता से था तो फिर क्यों वह अपनी सीता पर आस्था खो बैठे थे...क्या राम का अस्तित्व ही जरूरी था सीता के लिये और सीता का राम के लिये नहीं ? टिपिकल पुरुष की मेंटेलिटी..वाह ! हमेशा पुरुष अपने लिये और अपना स्वार्थ पूरा करने की सोचता है पत्नी का इस्तेमाल करके..की कैसे औरत को सीढ़ी बना कर ऊपर चढ़ जाये और फिर उस सीढ़ी को पैर से धक्का मार दे..क्या हर आदमी को ही जरूरत पड़ती है की स्त्री उसे उत्तम बनाती रहे..औरत को उत्तम बनाने के लिए कौन होना चाहिए ?..एक पुरुष..उसका जीवन साथी, है ना ? और यदि वह औरत का इस्तेमाल करके उसकी उपेक्षा करे तो औरत किसकी तरफ देखे..? बोलिये. जीवन साथी भी तो वही कुर्बानियां देकर दिखाये समय आने पर अपनी पत्नी के लिए तब ही तो रिश्ते की सार्थकता पता चलती है..हाँ, करते हैं कुछ लोग लेकिन सब नहीं..अधिकतर पुरुष इस समाज में स्वाभिमानी और भावना रहित होते हैं जो पत्नी की भावनाओं की कदर नहीं करते..उसे नीचा दिखाने, ताने देने व तंग करने को ही धरम निभाना समझते हैं..जिन्होंने महिलाओं को अपनी जायदाद समझा और उनके तन को अपनी जागीर!

भारत की तमाम युवा पीढ़ी समझती है नारी की महत्ता के बारे में और नारी खुद भी समझती है की वह जितना कर देगी निस्वार्थ सबके लिये वह पुरुष नहीं कर पायेगा...क्योंकि प्रकृति ने ही उसे कुछ गुण दिन हैं, क्षमता दी है..घर गृहस्थी को ढंग से रखने की, लोगों की देख भाल करने की व जीवन में सुन्दरता बिखेरने की...लेकिन आज के समाज में उसका इस्तेमाल करके पुरुष भूल जाता है इन सब बातों को..उसके गुणों में भी तुलना होती है चाहें वह कुछ भी सीख ले...जब तक कोई वस्तु नहीं है जीवन में तब तक उसका अभाव महसूस करना फिर उसके आते ही सब भूल जाना..यह पुरुष की फितरत में देखा गया है.. एक बात बताऊँ की नारी बहुत कुछ करने के बाद भी अपने को अपने मुंह से महान नहीं कहेगी..हाँ..अपनी महत्ता जरूर जानना चाहेगी कभी-कभी अपने चित्त की शान्ति के लिये....

जंगल में अपने राम से दूर, क्या-क्या नहीं उसपर बीता
राम तो अब भी राम ही रहे, पर आज सीता न रही सीता
ये कलियुग है जहाँ राम हैं कम, रावन ही दिखते चहुँ ओर
आज के राम को नहीं फिकर, फिर भी रखें सीता पर जोर.

राम ने अपनी सीता को आदर्शों की होली में झोंक दिया था बस एक समाज के कहने पर ही. लेकिन इस पर जरा अच्छी तरह गौर करिये कि सीता को केवल दो बार अग्नि-परीक्षा देनी पड़ी थी वह भी रामराज्य में पर आज की कितनी ही नारियों को आये दिन तरह-तरह की अग्नि-परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है. अग्नि केवल धधकती हुई लपटों वाली ही नहीं होती बल्कि जहाँ यातनायें बढ़ती जाती हैं अंतरात्मा झुलसने लगती है और नारी को उस यातना की अग्नि से गुजरना पड़ता है जो असहनीय होती है और मरते दम तक जलाती रहती है, वह भी एक अग्नि ही है. यहाँ पर सीता मैया और आज की नारी के बीच कुछ मोटे-मोटे से तथ्य हैं जिनपर भी नज़र डालना ज़रूरी है. कुछ में समानता है और कुछ में नहीं :

1. उस समय के हिसाब से सतयुग की सीता का जीवन बहुत सीधा-सादा व सरल सा था. घर गृहस्थी के मामले में भी और उम्मीदों की तुलनात्मक दृष्टि से भी. क्योंकि आज की नारी कलियुग की होते हुये भी उस युग की नारी से मानसिक विकास में अधिक हैं, साथ में मानसिक परेशानियाँ भी झेलती है. उसे ना जाने कितनी उम्मीदों पर खरा उतरना पड़ता है और उससे न जाने कितनी उम्मीदें बढ़ती ही रहती हैं...जिनका अंत ही नहीं होता। मानसिक और शारीरिक रूप से कामों में व्यस्त व सजग रहती है. उसके बाद भी कितनी ही अंतर्मन को झुलसा देने वाली अग्नि-परीक्षाओं से वह गुजरती है. लेकिन सीता को आज की नारी की तरह इतना कुछ नहीं सहना पड़ा था...फिर भी उनके नाम का ही उदाहरण दिया जाता है.

2. सीता के साथ हुये अन्याय के लिये राम ही जिम्मेदार थे जिन्होंने अपनी पत्नी को दूसरों के शक करने पर उनकी अग्नि परीक्षा ली पर उन्होंने कभी अपनी पत्नी का अपमान नहीं किया. लेकिन आज के तमाम राम (पति परमेश्वर) समाज के लिये नहीं बल्कि समाज से छिपा कर स्त्री में दोष ढूंढकर उसका अपमान करते हैं. कभी-कभी घरवालों के संग मिलकर भी ज्यादतियां और अत्याचार करते जाते हैं. (औरत इसमें दहकती है)

3. राम सीता के कहने पर केवल मृग के पीछे इसलिए भागे थे ताकि सीता को वह हिरन पकड़ कर दे सकें. किन्तु आज के राम की बुद्धि के कपाट कब बंद हो जाएँ पता ही नहीं चलता और कब वह किसी मायाविनी के पीछे पड़कर अपनी सीता जैसी पत्नी को तज दे उस छलना के लिये...कहना मुश्किल है. (औरत इसमें दहकती है)

4. कलियुग में भी घर के बाहर बहुत से रावण मिलेंगें जो स्त्री पर बुरी दृष्टी रखते हैं. किन्तु जिस रावण ने सीता मैया का अपहरण किया था उसने पवित्रता की मर्यादा नहीं लांघी और सीता पवित्र रहीं. वह रावण एक विद्वान व धार्मिक व्यक्ति था किन्तु उसने केवल अपनी बहन की जिद के आगे झुककर बदले की भावना से ही अपहरण के बारे में सोचा था. फिर भी सीता की पवित्रता पर शक किया गया. आजकल के युग में भी बाहरी रावणों से स्त्री बचती रहती है पर फिर भी शक किया जाता है, और ताने सुनती है. (औरत फिर दहकती है)

5. लक्ष्मण ने तो केवल कुटिया के बाहर ही रेखा खींची थी और सीता ने किसी बुरे इरादे से उसे नहीं लांघा था किन्तु उनका धोखे से अपहरण हो गया. और बाद में शक का शिकार बनीं, और आज की नारी वैसे तो निकलती है घर के बाहर लेकिन उसके लिये आज भी कुछ सामाजिक दायरों का बंधन है जिसका कभी धोखे से भी उल्लंघन हो गया तो पुरुष के शक की कटारी आ गिरती है उसपर. किसी पुरुष के संग निर्दोषता से भी हँसने-बोलने या बाहर जाने पर उसे सबकी निगाहों व बातों का शिकार बनकर ताने सुनने पड़ते हैं. लेकिन पुरुष अपनी मनमानी करते रहते हैं और कितने लोग अनदेखी कर जाते हैं. (औरत फिर दहकती है)

6. चलो मानते हैं कि उस समय रामराज्य था और उस समय की विचारधारा और थी। और एक राजा ने प्रजा को प्रभावित करने के लिए अपनी पत्नी को अग्नि परीक्षा देने को मजबूर कर दिया. उस प्रभावशाली व्यक्ति या देवता ने इस अक्षम्य अपराध को किया। पर आज के युग में...ऐसा क्यों ? क्या पुरुष भी ऐसी ही अग्नि परीक्षा देकर अपने को साबित कर सकते थे/ हैं ? क्या कहा...नहीं.
इसका मतलब है कि रामराज्य और कलियुग की नारी में एक बात की समानता अब भी है....और वह है उसपर शक किया जाना और परीक्षाओं से गुजरना.

आज का युग कलियुग कहा जाता है, नारी हर दिशा में सतयुग की नारी से बढ़-चढ़ कर है और हर क्षेत्र में पुरुष की बराबरी करने की इच्छा व क्षमता रखती है और सिद्ध कर चुकी है...पर आज के कितने पुरुषों की विचारधारा नारी को लेकर बदली है ? कोई बतायेगा ? आज की नारी मानसिक रूप से समर्थ होते हुये भी पुरुष से तरह-तरह की मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना सहती है. देश-विदेश में हर जगह देखो पुरुष का अहम् ही नारी का सबसे बड़ा दुश्मन बन रहा है. नारी की साधना, उसका आत्म विश्वास, उसका खिलखिलाना जब पुरुष तोड़ता है तो सब मुरझाकर भस्म हो जाता है. जीते जी कितनी ही नारियाँ सुलग रही हैं समाज में चारों तरफ. मिलने-जुलने वाले लोग आते हैं और अपनेपन की बातें करते हैं दिखावे को व मन बहलाने के लिए किन्तु जैसे ही वहां पर किसी नारी पर अत्याचार होने का आभास पाते हैं तो तुंरत ही वह सब अपने को एक किनारे कर लेते है, सोचते हुये कि ' हम क्यों किसी की बुराई-भलाई व झगडे में पड़ें '...उस समय उस लाचार औरत को कितने अकेलेपन का अहसास होता होगा क्या कभी किसी ने सोचा है? सभी अपने उस समय पराये हो जाते हैं उसके लिये. सबको अपनी-अपनी पड़ी रहती है इस दुनिया में. इसीलिए शायद कहा गया है कि ' यह दुनिया केवल मुंह देखे की है ', जहाँ किसी को सुख में देखा तो जलन और किसी को परेशानी में देखा तो मुँह छिपा कर खिसक लेते हैं लोग. एक टूटता हुआ इंसान सहारा न पाकर बिलकुल ही टूट जाता है. ऐसी स्थिति में एक इंसान की नहीं बल्कि कइयों के संबल की आवश्यकता होती है मुसीबत की मारी किसी नारी को. एक नहीं बल्कि तमाम आवाजों से किसी अत्याचार की दीवारें हिलाई जा सकती हैं. वरना जब तक हम यह चाहेंगे और होने देंगें तब तक यह सब होता रहेगा...क्योंकि नारी वसन लज्जा कहा जाता है और उस लज्जा से वह अपनी असलियत को नंगा नहीं करती क्योंकि अत्याचार के विरुद्ध बोलने से उसकी बदनामी होती है...और मुंह बंद रखकर कष्ट झेलती रहती है घर भर का सम्मान बचाने को. घर की मान-मर्यादा बचाकर सबके सामने अपनी तकलीफों को छिपाने का ढोंग करती रहती है जाने-पहचाने लोगों में...लेकिन फिर अन्दर ही अन्दर मन में घुटकर किसी के जाने बिना ही वह सबकी निगाहों से बचकर अपनी अग्नि में एक दिन वास्तव में मर जाती है...स्वाहा कर देती है अपने को अत्याचार की आग में...कितना दुखद और अजीब है यह क्रम!! सोचती हूँ कि सीता में तो दैविक शक्ति थी जो आज की नारी में नहीं है. और वह दूसरी बार अग्नि परीक्षा से गुजरते हुये अपमान को न झेल पायीं थीं और पृथ्वी में समा गयीं हमेशा के लिये. किन्तु आज की नारी तिल-तिल कर जलती है सोचते हुये कि वह भी धरती में समा जाये ताकि और अपमान ना सहना पड़े...

माँ, बहन, बेटी का रूप और पुरुष की सहचरी
जो सृष्टि की रचना करती वह तो केवल नारी है
दया-धरम, प्यार-ममता की मूरत का प्रतिरूप
इतना होने पर भी नारी इस धरती पर भारी है.

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