Sunday, 1 May 2011

एक भारतीय महिला को कैसा होना चाहिये ?

कहीं पर मैंने किसी पुरुष का लिखा पढ़ा '' भारतीय महिला को माडर्न बनना चाहिये किन्तु उसे किसी बिदेशी औरत की नकल नहीं करनी चाहिये.''


तो ये भई कौन सी और किस तरह की बात हुयी ? ये तो कोई पुरुष एक आर्डर सा दे रहा है भारतीय औरत को माडर्न बनने का. लेकिन साथ में उसकी लगाम भी खींच रहा है. है ना ? क्या इसी तरह से एक स्त्री भी भारतीय पुरुषों को हुकुम दे सकती है या उनसे अपेक्षा कर सकती है कि उन्हें क्या बनना चाहिये और क्या नहीं..और किस हद तक अपने को बदलना चाहिये..पुरुष तो अपने को बेलगाम ही पसंद करते हैं..सही है ना ? खुद को भारतीय कहने वाले पुरुष ( बिदेशों में रहने वाले भारतीयों को तो छोड़ो ) भारत में ही कौन सा धोती और गमछा में रहते हैं..सभी तो पैंट, शर्ट या टी-शर्ट और शोर्ट में दिखते हैं. खाना पीना, बोलना मनोरंजन और फैशन..क्या छोड़ा है जिसमें बदले नहीं..औरतों से अधिक तो पुरुष प्रदर्शन करते हैं बिदेशीपन की. आहाहा ! दाढ़ी और हेयर स्टाइल का क्या कहना..सर में तेल की जगह कभी GEL लगाकर बाल खड़े हैं, कभी मोहिकन कट, कभी गोटीकट और कभी बस ऊपर ही छत पर बाल और इधर-उधर से सफाचट..आदमियों के लिये मार्केट में तरह-तरह के बिदेशी शैम्पू और परफ्यूम..माडर्नपने की और क्रेजी होने की कोई सीमा भी है. कानों में बाली-बुँदे और नाक तक में कई लोग कील पहनते हैं, मुकाबले में किसी बात से कम नहीं हैं..और औरतों पर बंदिश ! कोई कितना माडर्न बनना चाहता है या नहीं ये उस पर ही छोड़ देना चाहिये.


मन में किरकिराहट सी होती है सोचकर कि सारा प्रेशर एक औरत पर ही क्यों डाला जाता है कि उसे कैसा बनना चाहिये और कैसा नहीं..क्या माडर्न बनने की छूट देने पर उसका कोई मापदंड होता है..फिर तो वो औरत परिस्थितिओं के चंगुल में फँसकर उसके बहाव में बह जायेगी..उसे अपने आप भी तो कुछ सोचने का मौका मिलना चाहिये..कई बार माडर्न सोसाइटी में मिलने-जुलने पर किसी औरत के बाल कटे होते हैं, किसी के लंबे..कोई साड़ी में, कोई शलवार-कमीज में तो कोई स्कर्ट में दिखेगी..कोई कम मेकअप, कोई कुछ अधिक किये हुये और कोई बिना किसी मेकअप के..लेकिन कई बार वो अपनी सहेलियों के साथ जैसा होगा उसका भी अनुसरण अपनी मर्जी से करती है..या उसका साथ देकर उसे खुश करने में भी करती है. इसी तरह सामाजिक अवसरों पर कोई जरूरी नहीं कि किसी शराब पीने वाले आदमी का साथ शराब पीकर ही दूसरे आदमी को देना पड़े. क्या जरूरी है कि नकलची बना जाये ? चाहें उसके बाद सेहत बिगड़ जाये और जाकर उलटी कर दे..और ये भी जरूरी नहीं कि पति शराब पीता हो तो उसकी औरत भी पीने लगे वरना वो माडर्न नहीं रहेगी.


ये माडर्न होना क्या होता है ? खाली खाना-पहनावा ही तो नहीं...क्योंकि होने को तो बहुत कुछ हो रहा है भारतीय समाज में बिदेशियों की नकल करके. तो किस-किस माडर्न चीज पर बंदिश होनी चाहिये ? आखिरकार कोई तो लिस्ट बनाये. पहनावा की बातें अपनी इच्छानुकूल भी अपनी भावनाओं पर निर्भर करती हैं. और कभी-कभी हर किसी की परिस्थितियाँ भी होती हैं. और ये भी कोई जरूरी नहीं कि एक औरत दूसरों को खुश करने के लिये अपनी इच्छा के विपरीत पहनावे में माडर्न बने. लोगों के लिये नुमाइश बनने से तो अच्छा है कि अगर सस्ता कपड़ा भी सलीके से पहना जाये तो इंसान अपनी आंतरिक खुशी में तो जी सकता है..सारी दुनिया को तो खुश करने के लिये ही तो नहीं जिया जाता हमेशा..कुछ अपनी भी चाहत और खुशियाँ होती हैं..चाहें वो पहनावा हो या कुछ और. हम कई बार परिस्थितिओं को भी चुनौती देकर अपने तरीके से और सलीके से जी सकते हैं. समाज में तो जितने मुँह, उतनी बातें होती हैं..एक ही ड्रेस की कोई इंसान तारीफ़ करेगा तो दूसरा मुँह दबा कर हँसेगा..किस-किस की परवाह की जाये...Just be yourself.


Tuesday, 5 April 2011

छक्का कैसे बना ?

क्रिकेट के विश्व कप का फाइनल मैच - ०२.०४.२०११

आप सबको जानकर हैरानी होगी कि मैंने दो साल से टीवी नहीं देखा था केवल क्रिकेट देखने के चक्कर में प्रण तोड़ा था. देखते हुये फेसबुक पर बराबर दोस्तों के संग कमेंट्री जारी रही...उसका जज्बा कोई नहीं जान सकता..हूँ : ) लंकियों ने तो रन बना-बनाकर बहुत धमाचौकड़ी मचाई हुई थी. उससे कुछ मन में दहशत सी होने लगी थी. फिर जब भारत की टीम की बारी आई और खेल शुरू हुआ तो बीच-बीच में कई बार मैंने जोर से भगवान से प्राथना की तो फिर चौके भी बने ( ये वाकई में सच है ). राम जी, हनुमान जी, और किशन कन्हैया सभी को इन्वाल्व कर लिया...सभी को अपनी भक्ति का अहसास दिला रही थी. जोश में पता नहीं कितनी अटरम-शटरम बातें भी होती रहीं हम सबकी आपस में जिन्हें बताने में जरा झेंप लग रही है..हा हाहा. और आखिर में मेरी प्रार्थना ने कमाल कर दिया..जब चार रन की जरूरत थी तो जैसे ही मेरे मुँह से निकला 'अरे मार दे अब चौका' तो धोनी के हाथ का बल्ला जो घूमा..तो छक्का ही हो गया :))

धोनी अब जीत की हवा खा रहे हैं..और उनको इन सब बातों का जिंदगी में कभी पता भी नहीं चल पायेगा कि उनकी जीत के पीछे हमने भी कितने पापड़ बेले थे. उन घंटों में ब्लड प्रेशर भी अप एंड डाउन होता रहा..भूख-प्यास भी भूल गये...हाँ चाय जरूर पीते रहे थे :)))) एक फेसबुक वाली मित्र अपना जिताने वाला चश्मा भी बराबर पहने रही थी खेल के दौरान. हमने उनसे कहा कि वह किसी भी हाल में उस चश्मे को हमारे भारत की जीत के पहले ना उतारे...अगर नींद आ जाये और सोना चाहे तब भी नहीं..खेल के बीच में हमने भी दो बार अपना चश्मा बदल कर देखा कि कौन सा जीत के लिये सही रहेगा :)) खैर, इस सबका प्रभाव ये हुआ कि धोनी ने दूसरी टीम के छक्के छुड़ा दिये..सबको धोकर निचोड़ दिया..और बिश्व कप को सफाई से जीत लिया. सब लोग बोलो..धोनी की..जय हो ! हिन्दुस्तान...जिंदाबाद !


Monday, 4 April 2011

मदर्स डे क्यों मनाते हैं ?

जैसे ही मदर्स डे आता है हर साल..उसके बारे में सवाल भी चारों तरफ से सबकी आँखों में दिखने लगते हैं. भारत के लोगों में बहुत कौतूहल रहता है और अपनी जिज्ञासा जाहिर करने लगते हैं. और ये सवाल हर बार, हर साल ही उठता है कि मातृ-दिवस यहाँ इंग्लैंड व अन्य पश्चिमी देशों में क्यों मनाया जाता है...क्योंकि सबका तर्क होता है कि माँ का प्यार तो हमेशा हर दिन अपने बच्चे के लिये एक सा ही रहता है तो फिर साल में एक दिन को ही क्यों उस प्यार की खातिर रखा गया है ? हाँ, बिलकुल सही है ये सवाल क्योंकि एक माँ का प्रेम पवित्र गंगा की अनवरत धारा के समान हमेशा बहता रहता है...तो भई, फिर साल का एक खास दिन ही क्यों इसके लिये सुनिश्चित किया गया है उसकी अहमियत जताने के लिये ? हालाँकि, अब भारत में भी पश्चिमी सभ्यता की नकल करके बहुत लोग इस दिवस को मनाने लगे हैं..लेकिन शायद बहुत से लोग इससे अनभिज्ञ हैं. जो मनाते हैं वहाँ पर वो शायद इसे एक फैशन की तरह ले रहे हैं..वैलेनटाइन दिवस, शादी की सालगिरह, और जन्मदिवस मनाने की तरह..क्योंकि अब इन्हें भी वहाँ के लोग मनाने लगे हैं.

र रिश्ते का महत्व हर दिन होना चाहिये..तो फिर साल के एक खास दिन ही क्यों उसको धूम-धाम से मनाते हैं ?

तो सब लोगों के सवालों के जबाब में मैं कुछ अधिक नहीं बस अपने सीधे-साधे लहजे में ही कुछ कहना चाहूँगी कि हर दिन, हर जगह ये मदर्स डे एक सा ही रहता है. और एक माँ का प्यार हर दिन निस्वार्थ ही होता है. हर माँ अपने बच्चों को अच्छे संस्कार देने की कोशिश करती है. उन संस्कारों को और माँ के निस्वार्थ प्यार और त्याग को कुछ बच्चे याद रखते हैं और कुछ नहीं. लेकिन माँ के इस निस्वार्थ प्यार व त्याग को याद रखने को, एक खास तरह का आदर देने को उसके सम्मान में पश्चिमी देशों में एक पर्व यानि त्योहार जैसा बना दिया गया है.

जैसा कि आप सभी जानते हैं कि भारत में भी तमाम पर्व होते हैं. तो उदाहरण के तौर पर आप सभी अपने आप से पूछिये कि रक्षा बंधन का क्या महत्व है..क्यों मनाते हैं हम इसे ? इसलिये...क्योंकि ये है भाई-बहन के प्यार का प्रतीक, है ना..? बहन का प्यार भी तो निस्वार्थ होता है. तो बस यही बात है मदर्स डे की भी. ये माँ और बच्चे के आपस के प्रेम और त्याग का प्रतीक है. और इसीलिए मदर्स डे को एक विशेष त्योहार बना दिया गया है. बहनें भी कहाँ भाइयों से माँगती हैं रक्षा-बंधन पर..फिर भी भाई लोग उपहार देते हैं. क्यों मनाते हैं वो लोग राखी दिवस को ? क्या बहनें कहती हैं ? नहीं...इसलिये,क्योंकि परम्परा डाल दी गयी है इस दिवस की. उसी तरह से यहाँ मदर्स डे भी मनाया जाने लगा. लोगों ने माँ को आदर देने के लिये भी एक परम्परा चालू कर दी. कोई माँ नहीं कहती ना ही कहेगी शायद इस त्योहार को मनाने के लिये. बच्चे ही इसे परम्परा बना कर निभाने लगे हैं यहाँ.

हम माँ लोग कहाँ बच्चों से पूछते हैं कुछ हमें देने को या हमारे लिये कुछ करने को..अब देखो, मेरे बेटे ने कल मुझे कुछ पैसे दिये और डिनर वगैरा के लिये भी मुझे बेटा और बेटी ले गये. मैंने कहा कि मेरा प्यार तुम्हारे पैसे के लिये नहीं है. मुझे तुम्हारे प्यार व अच्छे वर्ताव की जरूरत है. पैसा जब लूँगी जब कोई मजबूरी होगी. फिर भी न लेने पर वह नाराज़ हो गया तो मुझे मन ना होते हुये भी लेना पड़ा..बस उसे खुश करने के लिये :)


औरत की शादी या बर्बादी ?

भारत की नारी वो शक्ति जो पहचान अलग बनाती है 
वह सीता, दुर्गा, लक्ष्मी जैसे नामों से जानी जाती है 
फिर भी संकीर्ण बिचारों का साम्राज्य यहाँ पर फैला है  
जो फन फैलाकर डसता है वो तड़प-तड़प रह जाती है.  
भारतीय समाज में बेटियाँ जब पैदा होती हैं तो उनके दिमाग में ठूँस-ठूँस कर भरा जाता है कि वह पराया धन हैं. जब भी और जहाँ भी वह शादी होकर जायेंगी तो ससुराल ही उनका अपना घर होगा. वह बचपन से ही एक अच्छी बेटी और बहिन बनने की कोशिश करती हैं और ससुराल में निभाने के लिये भी सभ्यता और संस्कार सीखती है. और फिर शादी के बाद ससुराल में आकर तमाम रिश्तों की जिम्मेदारी निभाती है. पर दोनों ही जगह उनका महत्व होते हुये भी वह परायी क्यों रहती है ? और कई बार उनके सम्मान पर भी ज्वलंत सवाल उठते हैं और कभी-कभी आग का रूप भी धारण करते रहे हैं. किन्तु हर बार इन सवालों को बुझा दिया जाता है.  
वाकई में नारी जीवन सुलभ नहीं..ये सच है तो बहुत कड़वा. क्योंकि परेशानी में होने पर उनके मन की चीत्कार और पुकार कोई नहीं सुनता और न ही सहायता के लिये कोई आता है...शादी के बाद उन्हें पराया धन कहकर माँ-बाप विदा कर देते हैं कि पति का घर ही उनका असली घर है..किन्तु यह कितना सही हो पाता है...मन ही मन में उनकी चीत्कार प्रतिध्वनि करती रहती है. और कितनी शर्मनाक बात है कि हम आज औरत के अधिकार की बात करते हैं. पर कोई बताये तो सही कि कौन से अधिकार ? माता-पिता के घर में पराया धन समझी जाती है..क़ानून बनने के बाद भी तमाम बेटियाँ पैत्रक सम्पति पर भी जोर नहीं रखती क्योंकि उन्हें समझाया जाता है कि उनके भाई ही उनके माता-पिता की देखभाल करेंगे और उन्हें उनकी ससुराल से जरूरत आने पर विदा कराके लायेंगे और मायके में उनकी सुख-सुविधा का ध्यान रखेंगे..किन्तु ये सब ढकोसलेबाजी है. आजकल ना तो भाइयों का उतना लगाव रहा है और ना ही वह अपनी बहिनों की उनकी परेशानियों में रक्षा करते हैं. और ना ही उनके पास समय है. खुद ही बहिनें अपने आप देखने आ जाती हैं. कई जगह तो बहिनें कुछ भी लेने की वजाय अपना ही पैसा खर्च करती हैं और माँ-बाप को भी रखती हैं. 
इस समाज में यह एक काले धब्बे की तरह सच है जो छुपाया नहीं जा सकता कि कितनी ही जगह नारी पर पढ़ी-लिखी होने के वावजूद भी अत्याचार होता है. एक लड़की अपने माता-पिता का घरबार किसी दूसरे परिवार के आश्वासन पर छोड़ कर आती है. एक खूँटे से खोलकर उसे दूसरे खूँटे से इस समाज के बनाये हुये नियमों पर बकरी या गाय की तरह लाकर बाँध दिया जाता है..एक नये संसार में नये लोगों के बीच यह सोचकर और भरोसा करके कि उसका पति और ससुराल वाले उसकी हर बात में रक्षा करेंगे. किन्तु यह अधिकतर सच नहीं होता. उससे काम भरपूर लेने के वावजूद भी उसे '' पराई बेटी '' कहकर रखा जाता है. और मायके वाले कहते हैं कि : '' बेटी अब ये तुम्हारी किस्मत रही. '' और अगर पत्नी में सभी गुणों के होने पर भी पति की नीयत बदल जाये तो वह क्या करेगी ? औरत मजबूरी में कितना सहती है ससुराल वालों के लिये..अपने पति के लिये कितना कुछ झूठ बोल जाती है. कुछ पति व दामाद बहुत स्मार्ट होते हैं..औरों के सामने बहुत चतुराई से व्यवहार करके उन लोगों का दिल जीत लेते हैं और सच को झूठ साबित कर देते हैं...फिर भी शादी की गाड़ी खिंचती रहती है.  
नारी को एक ऐसा अभिशाप बना रखा है अपने समाज में कि उसे अपनी स्थिति का खुद ही नहीं पता कि उसका वजूद क्या है. शादी के पहले माँ-बाप के घर को वह अपना कहती है तो उसे बराबर अहसास कराया जाता है कि वह पराया धन है..फिर भी उसकी अकल में नहीं आता. घर-भर का ख्याल रखना, पढ़ना-लिखना, घर का काम-काज सीखना व अच्छे संस्कारों को सीखना ताकि उसे अपने जीवन में कोई समस्या ना हो और ससुराल में भी उसे सम्मान मिले. लेकिन फिर पति के यहाँ आने पर अगर सुनना पड़े कि '' मैंने तेरे बाप का कर्जा नहीं खाया..तू क्या अपने बाप के यहाँ से ये घर लाई है या वो लाई है '' आदि कहकर उसे परायेपन का अहसास दिलाया जाता है..तो उसे पति के यहाँ कैसे अपनापन लग सकता है ? कितने समझौते करते हुये भी शादी एक ऐसा कड़वा घूँट है कुछ औरतों के लिये कि वह चाहें कितनी भी कोशिश करें ससुराल में सबको खुश करने को तो भी नहीं कर पाती हैं...सब सहन करती हुई शादी के बंधन को एक कड़वे घूँट की तरह ना ही उसे घूँट पाती है और ना ही थूक पाती है...और आपसी रिश्तों की कटुता बढ़ती जाती है. लेकिन पति का घर छोड़ कर उन ज्यादतियों से बचकर औरत कहाँ जाये ? ये सब वह जान बूझ कर क्यों सहती है ? एक दिन जिस इंसान का हाथ पकड़ कर वह आती हैं और जो शादी के समय उसका संरक्षण करने का दावा करता है बाद में उसके ही हाथों से मार खाती है..जिस मुँह से वह वचन लेते हैं अग्नि को साक्षी मानकर साथ निभाने का उसी मुँह से वह बाद में पत्नी को किलस कर गालियाँ देकर उसे कोसते हैं और उसका अपमान करते हैं. कुछ पुरुष उन्हें घर वालों के संग मिलकर भी सताते हैं. एक समय वह था जब नारी को हर यज्ञ में बराबर का स्थान और घर में गृह-लक्ष्मी का दर्ज़ा दिया जाता था..और उससे हर बात में सलाह-मशवरा लेकर काम किया जाता था..और सम्मान दिया जाता था. और अब कई पुरुष अपने उन रटे-रटाये अग्नि के फेरे वाले वचनों को भूल कर पत्नी से चुरा-छिपा कर मनमानी करते हैं. और अगर कोई ताड़ ले उनके अत्याचारों को तो अपनी पत्नी के विरुद्ध कहानी गढ़ कर उस पर झूठे / मनगढंत दोषारोपण करके दूसरों की निगाह में उसे ही कसूरवार ठहरा देते हैं. और पत्नी अवाक सी रह जाती है. पुरुष अगर अकेले रहकर गुजर करते हैं तो उनपर कोई उँगली नहीं उठाता..लेकिन अगर एक औरत अकेली रहकर कहीं गुजर करना चाहे तो समाज उसका जीना मुश्किल कर देता है. किसी पुरुष से निर्दोषता से बात भी करे तो उसपर बदचलन होने का इलजाम भी लगते देर नहीं लगती. अगर सोचिये, तो शायद यही कारण हो सकता है कि इस डर से पढ़ी लिखी औरतें भी अपने पति के संग उनकी ज्यादती सहते हुये एक गुलाम की तरह रहती है. और उनके माँ-बाप सोचते हैं कि उनकी लाडो बेटी ससुराल में रानी बनकर राज कर रही होगी..हाँ कुछ करती हैं जो बहुत किस्मत वाली होती हैं. जैसा मैंने कहीं सुना है कि कहीं तो किसान की बेटी भी सबको मुट्ठी में रखती है और कहीं जज की बेटी को भी पति के हाथों मार खानी पड़ती है. लेकिन हर हाल में अधिकाँश की दशा शोचनीय ही है. अगर समाज के तानों को झेलने की जिल्लत ना सहनी पड़े तो पता नहीं कितनी औरतें बिना शादी किये हुये आत्मनिर्भर होकर जीना पसंद करेंगी. शादी का ऐसा बंधन जो खुशी की वजाय उसके जीवन और अस्तित्व को झकझोर डाले तो इससे तो अच्छा है कि वह किसी तरह अपनी बसर खुद ही कर ले. इस दिखावे के बंधन का क्या फायदा जहाँ सच्चा प्यार व सहानुभूति मिलने की जगह उसका जीना ही दूभर हो जाये.
एक और खास बात है इस समाज की वो ये कि हर कोई लड़की यानि होने वाली बहू को तो स्वस्थ्य लेना चाहता है किन्तु लड़का अगर किसी बीमारी को भुगत रहा है तो कोई बात नहीं. लेकिन उस लड़की का क्या हो जिसका शादी के तुरंत बाद एक्सीडेंट हो जाये या किसी गंभीर बीमारी का शिकार बन जाये ? शायद उसे वो लोग भुगत लेते होंगे किसी तरह.
जिस देश में पवित्र नदियाँ गंगा, जमुना, सरस्वती और दुर्गा, सरस्वती, लक्ष्मी, गौरी जैसी देवियों की पूजा होती है. और उनके नाम पर लोग अक्सर अपनी बेटियों के नाम भी रखते हैं. बाद में वही बेटियाँ व बहिनें किसी की पत्नी, बहू, और माँ बनती हैं. लेकिन शादी के पहले माता-पिता के यहाँ भार होती हैं फिर पति के यहाँ जाकर '' पराई बेटी '' के नाम से जानी जाती हैं और बात-बात में अपमान सहती हैं. नारी की स्थिति कितनी दयनीय बना कर रख दी है इस समाज ने..अगर अपने पति को छोड़कर वह अपना अलग अस्तित्व कायम करती हैं तो समाज उन्हें नहीं जीने देगा और वह सबकी निगाहों में निरंतर प्रश्न बनी रहेंगी या उनकी भूखी आँखों का शिकार बनेंगी. इसीलिए पति को छोड़कर बदनामी के भय को न सह पाने के डर से वह कोई भी ऐसा-वैसा कदम ना उठाकर सब कुछ चुपचाप सहती रहती है.

Friday, 3 December 2010

फेसबुक या फिर...फसबुक ( Fuss Book ) ?

हे भगवान ! फेसबुक पर झंझटों का जमघट..अब ये सब कुछ कहते भी नहीं बनता और सहते भी नहीं बनता.
जो कुछ मैं कहने जा रही हूँ फेसबुक के बारे में वो सभी फेसबुकियों के बारे में सही है या नहीं ये तो नहीं कह सकती पर कुछ फेसबुकियों को जरूर हजम नहीं हो रही हैं ये बातें. और इतना तो क्लियर है ही कि चाहें हर कोई मुँह से ना बताये कि कितना पेन होता है उन्हें ( इन्क्लूडिंग मी ) कुछ लोगों की टैक्टिक से कि अब फेसबुक एक फसबुक यानि झंझट, या कहो कि सरदर्द लगने लगा है. फेसबुक पर भ्रष्टाचार उपज रहा है...कहानियाँ सुनी जा रही हैं..घटनायें होती रहती हैं जिनका उपाय समझ में नहीं आता...ना ही निगलना हो पाता है ना ही उगलना...यानि उन बातों के बारे में साफ-साफ कहने में तकलीफ होती है सबको और पचाने में भी तकलीफ...ये सब फेसबुक देवता की मेहरबानी है...दिमाग में बड़ी उथल पुथल मचती है..कुछ फेसबुकियों को बहुत सरदर्द हो रहा है जो इसमें काफी फँस चुके हैं...अब कश्ती मँझदार में फंसी है और किनारा मिल नहीं रहा है...

फेसबुक पर आना शुरू-शुरू में तो बड़ा ट्रेंडी और खुशगवार लगता है..लेकिन नये-नये होने पर नर्वसनेस भी जरूर होती है..फिर हर इंसान धीरे-धीरे उसमे रमकर जम जाता है. और फिर जैसे-जैसे इसमें धंसते जाओ..मतलब ये कि लोगों से और उनकी रचनाओं से मुलाक़ात करते जाओ तो अक्सर क्या अधिकतर ही बहुत बोझ बढ़ जाता है जिससे एक तरह का प्रेशर भी जिंदगी पे पड़ने लगता है..कुछ लोग फ्रेंड बनते ही पेज पर आकर सबके साथ नहीं बल्कि केवल इनबा
क्स में ही अलग-अलग आकर वही एक से पर्सनल लाइफ के बारे में सवाल पूछते हैं और समझाने पर बुरा मान जाते हैं..इनबाक्स में कभी-कभार जरूरत पड़ने पर ही बाते होती हैं..ये नहीं कि किसी को साँस लेने की फुर्सत ना दो..सवाल के बाद सवाल करते हैं व्यक्तिगत जीवन के बारे में उसी समय तुरंत ही मित्र बनने के बाद. कितनी अजीब सी बात है
कि पेज पर आकर खुलकर सबके सामने बात नहीं करते..और दूसरी टाइप के वो हैं जो बहुत सारी वाल फोटो लगाकर दुखी करते रहते हैं..पहले बड़ा मजा आता था किन्तु अब उन वाल फोटो की संख्या बढ़ती जाती है..और अगर धोखे से भी ( या कभी-कभी जानबूझ कर भी अपनी सुविधा के लिये ) डिलीट हो जाती
हैं तो फिर दुविधा में फँस जाने के चांसेज रहते हैं..वो टैगिंग करने वाला इंसान अपने तीसरे नेत्र से पूरा हाल लेता रहता है..और पूछने की हिम्मत भी रखता है कि...'' क्या आपने हमें अपनी फ्रेंड लिस्ट से निकाल दिया है '' या '' क्या आप मुझसे नाराज हैं '' या फिर अपने स्टेटस में कोई सज्जन लिखते हैं कि '' अगर कोई मेरी रचनाओं पर टैगिंग नहीं चाहता तो साफ-साफ क्यों नहीं बताता मुझे ताकि आगे से उनको टैग ना करें हम '' अब आप ये बताइये कि समझदार के लिये इशारा वाली कहावत का फिर क्या मतलब रह गया...अरे भाई, कभी तो हिंट भी लेना चाहिये ना, कि नहीं ? और साथ में धकाधक भजन के वीडियो भी एक इंसान की वाल पर आ रहे हैं कई-कई लोगों के एक ही दिन में और साथ में उन्हीं की दो-दो रचनायें भी..और बाकी अन्य लोग भी टैग कर रहे हैं तो पढ़ने वाले का दिमाग पगला जाता है सोचकर कि इतना समय कहाँ से लाये सबको खुश करने को..कुछ और अपने भी तो पर्सनल काम होते हैं आखिरकार. एक रचना कुछ दिन तो चलने दें ताकि आराम से सभी की रचनाओं को पढ़ा जा सके और अपना भी काम किया जा सके. पर इस अन्याय / अत्याचार के बारे में कैसे समझाया जाये किसी को. हर किसी को अपनी पड़ी है यहाँ...चाहें किसी के पास टाइम हो या न हो. और ऊपर से मजेदार बात ये कि वो इंसान तुरंत कमेन्ट लेना चाहता है. कुछ लोग तो लगान वसूल करने जैसा हिसाब रखते हैं कि एक भी इंसान छूट ना जाये कमेन्ट देने से. उस बेचारे की मजबूरियों का ध्यान नहीं रखा जाता...शेक्सपिअर के ' मर्चेंट आफ वेनिस ' जैसे उन्हें भी बदले में फ्लेश जैसी चीज चाहिये अगर जल्दी कमेन्ट ना दे पाओ तो पूछताछ चालू कर देते हैं...बस अपने से ही मतलब. और कुछ लोग बड़े-बड़े आलेख लगाते हैं और वो भी एक दिन में दो-दो जैसे कि लोगों को केवल उनका ही लेख पढ़ना है...ये नहीं सोचते कि अन्य लोगों ने भी किसी को अपनी रचनाओं में टैग कर रखा है...एक आफिस के काम से भी ज्यादा समय लग जाता है अब फेसबुक पर. मेल बाक्स के कमेन्ट पढ़ने, लिखने और मिटाने में ही कितना टाइम लग जाता है. खैर...

कुछ लोग कितने स्मार्ट होते हैं कमेन्ट लेने के बारे में इस पर जरा देखिये:

फ्रेंड: नमस्ते शन्नो जी, मुझसे कुछ नाराज हैं क्या ? मैं अपनी खता समझ नहीं पा रहा हूँ...

मैं: अरे आप ये कैसी बातें कर रहे हैं..मैं भला आपसे क्यों नाराज़ होने लगी. इधर काफी दिनों से मुझे समय अधिक नहीं मिल पाता है फेसबुक पर एक्टिव होने के लिये...इसीलिए शायद आपको ऐसा लगा होगा. मैं किसी से भी नाराज नहीं हूँ..बस समय और थकान से मात खा जाती हूँ. इसी वजह से कुछ अधिक लिख भी नहीं पाती हूँ इन दिनों.

फ्रेंड: मेरे कई फोटोग्राफ से बिना कोई प्रतिक्रिया के आपने अपने आप को अनटैग कर लिया. तभी मुझे ऐसा महसूस हुआ था.

मैं: जी, टैगिंग तो इसलिये हटानी पड़ी कि वहाँ पर कमेन्ट बाक्स नही सूझता था मुझे...शायद कोई फाल्ट होने से. और बहुत लोग अब वाल पिक्चर ही लगाते हैं तो बहुत इकट्ठी हो गयी थीं इसलिये एक फ्रेंड ने सलाह दी तो कुछ को छोड़कर बहुत सी हटानी पड़ीं.

( ये अपनी टैगिंग का ध्यान रखते हुये हर किसी से कमेन्ट ऐसे वसूल करते हैं जैसे कि कर वसूली कर रहे हों..किसी को भी छोड़ना नहीं चाहते खासतौर से उन लोगों को जो उनसे शिकायत करने में कमजोर हैं..या झिझकते हैं )

मैं: जब मैं आपको अपनी रचनाओं में टैग करती थी..तो आप कमेन्ट नहीं देते थे तो फिर मैंने आपको टैग करना बंद कर दिया...किन्तु कभी शिकायत करने की हिम्मत नहीं कर पायी फेसबुक पर किसी दोस्त से कि कोई बुरा न मान जाये इसलिये.

( इतना कहते ही मुझे लगा कि वो मेरी जुर्रत से खिसिया गये )

फ्रेंड: क्षमा कीजियेगा मेरे इन्टरनेट अकाउंट की लिमिट प्रतिमाह १ जी बी तक ही है और वह आमतौर पर महीने की २३-से २४ तारीख तक पूरी हो जाती है इसी लिए कमेन्ट कम कर पाता हूँ. यदि आपको कमेन्ट बॉक्स ना मिले तो मेरी फोटो के ऊपर मेरी Profile को क्लिक करियेगा जिससे मेरा पेज खुल जायेगा फिर पेज के साइड में ऊपर की ओर बने हुए "Like" बटन को क्लिक कर दीजियेगा तब कमेन्ट बॉक्स दिखने लगेगा.

मैं: हर किसी की अपनी मजबूरियाँ होती हैं...मैं समझती हूँ..औरतों को तो घर के भी काम करने पड़ते हैं..मैं तो कई बार सारे दिन के बाद फेसबुक पर आ पाती हूँ तो सबकी रचनाओं पर लोगों के कमेन्ट से मेलबाक्स भरा होता है और निपटाते हुये घंटों लग जाते हैं..बड़े-बड़े लेख पढ़ने का तो समय ही नहीं मिलता...इसलिये बहुत कुछ छूट जाता है. जब मैं टैगिंग करती हूँ तो बहुत से लोग जबाब नहीं देते तो मैं समझ जाती हूँ कि उनकी भी कुछ मजबूरियाँ होंगी. और कुछ लोग अपनी रचनायें एक के बाद एक लगाते हैं और तब मुश्किल हो जाती है एक ही दिन में कमेन्ट देने में..वो बस अपनी ही रचनाओं के कमेन्ट पर ध्यान देते हैं....फिर मेरी रचनाओं पर कमेन्ट के समय गायब हो जाते हैं..इस तरह के कई लोग हैं...

( अब उन्हें लगने लगा कि मेरे भी मुँह में जबान है तो...)

फ्रेंड: बिलकुल सही कहा आपने .......सबकी अपनी मजबूरियाँ....... आपका बहुत-बहुत धन्यवाद ......शुभ रात्रि.

मैं: देखिये, मैंने आपको अपनी तरफ से हर बात शत-प्रतिशत ईमानदारी से सही-सही बताई हैं...पर आप बुरा ना मानियेगा...नो हार्ड फीलिंग्स..ओ के ?...शुभ रात्रि !

Tuesday, 2 November 2010

गाइ फाक्स डे ( GUY FAWKES DAY )

HAPPY DIWALI !!

आज आप सबको अपने भारत में मनाये जाने वाले दिवाली-दिवस की तरह इंग्लैंड में मनाये जाने वाले एक दिवस के बारे में बताती हूँ जिसे '' गाइ फाक्स डे '' के नाम से सब जानते हैं. और इस दिन को खुशी से मनाने के लिये 5 नबम्बर को शाम से आधी रात तक यहाँ जगह-जगह खूब फुलझड़ियाँ और बम-पटाखे फोड़े जाते हैं. इस बार अपना त्योहार दिवाली भी इसी दिन पड़ रहा है तो सोचा कि लाओ आप लोगों को '' गाइ फाक्स डे '' के बारे में भी कुछ बताऊँ. और अब केवल 5 नबम्बर को ही नहीं बल्कि हफ्ते भर पहले से ही लोग फुलझड़ी और पटाखे फोड़ने लगते हैं. जिनकी आवाज़ दूर-दूर तक जाती है. लेकिन 5 नबम्बर को स्पेशल प्रोग्राम होते हैं. हर एरिया के बड़े-बड़े पार्क में खूब धूम-धड़ाका होता है. लोग दूर-दूर से देखने के लिये आते हैं. और ये क्यों मनाया जाता है इसके बारे में अब आप लोगों को बताती हूँ :

बहुत समय पहले 1570 में इंग्लैण्ड में, जब रानी एलिजाबेथ प्रथम का राज्य था, गाइ फाक्स नाम के एक व्यक्ति ने जन्म लिया. उसका पिता प्रोटेस्टेंट था और माँ कैथोलिक थी. जब वो नौ साल का था तो उसके पिता की मृत्यु हो गयी और माँ ने दूसरी शादी कर ली. उसका दूसरा पति कैथोलिक था. गाइ का धर्म अब कैथोलिक हो गया. उसकी दो बहिनें भी थीं..और उसे बाहर बोर्डिंग स्कूल में पढ़ने के लिये भेज दिया गया. वहाँ पर उसके अधिकतर दोस्त कैथोलिक थे. उसकी पढ़ाई चलती रही पर छुट्टियों में वह अपने घर वापस आ जाता था परिवार से मिलने के लिये. स्कूल में उसके अधिकतर दोस्त कैथोलिक धर्म के थे.

तो इंग्लैंड में उस समय दो धर्म चल रहे थे एक का नाम था '' प्रोटेस्टेंट '' और दूसरा '' कैथोलिक ''. रानी प्रोटेस्टेंट थी और लोगों में झगड़े पड़े रहते थे कि कौन सा धर्म सही है. कैथोलिक लोग चाहते थे कि उनपर शासन करने वाला कैथोलिक हो. वहाँ की पार्लियामेंट को डर था कि कहीं कैथोलिक लोग रानी को मार ना दें, इसीलिये सारे कानून उनके खिलाफ बना दिये गये. खैर, 1603 में रानी की मृत्यु हो गयी और फिर वहाँ जेम्स नाम का व्यक्ति राजा बना जो जेम्स प्रथम के नाम से जाना गया. वो भी प्रोटेस्टेंट था और वो चाहता था कि सारी प्रजा प्रोटेस्टेंट हो जाये. कैथोलिक लोग चुरा-छिपा कर अपने धर्म की पूजा करते थे वर्ना उन्हें कड़ी सजा मिलती थी..कभी जुर्माना होता था तो कभी जेल में डाल दिया जाता था. गाइ का परिवार कैथोलिक था. वो बड़ा होकर स्पेन जाकर, जो एक कैथोलिक देश था, एक अच्छा सिपाही बना.

जेम्स बहुत ही क्रूर था और कैथोलिक लोग उससे बहुत नाराज रहते थे. कुछ तो उसे मारने की भी कोशिश करते रहते थे. पर वो राजा हर बार बच जाता था. फिर एक बार की बात है कि कुछ लोगों के ग्रुप ने, अपने लीडर के साथ जिसका नाम रॉबर्ट गेट्सबी था पर राबिन नाम से जाना जाता था, राजा को मारने की नयी स्कीम बनायी. और जब गाइ के कानों में ये बात पड़ी तो 1604 में गाइ वापस इंग्लैंड आ गया. ये स्कीम बहुत खतरनाक थी. राजा जेम्स का बिचार 1605 में एक नयी पार्लियामेंट खोलने का था. गाइ ने हाउस आफ लार्ड्स को बारूद से उड़ाने का प्लान बनाया जिसमें राजा, उसकी रानी व उनका बड़ा बेटा सभी मारे जाते और फिर कैथोलिक लोगों का राज्य हो जाता. उसके गिरोह में और लोग शामिल हुये और अंत में कुल मिलाकर तेरह लोग हो गये. उस समय पार्लियामेंट के चारों तरफ तमाम घर व दुकानें थी. गाइ ने उस इमारत से लगा हुआ एक घर किराये पर ले लिया और वहाँ एक नौकर की तरह काम करने लगा. और अपने साथियों के साथ मिलकर प्लान बनाने लगा कि किस तरह से पार्लियामेंट बिल्डिंग के नीचे बारूद बिछाया जाये. उनकी हर बात गुप्त रखी जाती थी. फिर उन्होंने किसी तरह बिल्डिंग के नीचे के स्टोररूम में 36 लकड़ी के ड्रम पहुँचाये जिनमें बारूद भरा हुआ था.

लेकिन किस्मत से एक दिन एक लार्ड मौन्टीगल नाम के व्यक्ति को किसी ने एक पत्र भिजवाया जिसमे लिखा था कि उस खास दिन को पार्लियामेंट का उद्घाटन समारोह ना किया जाये. आज तक किसी को नहीं पता वो पत्र किसने लिखा था. लोगों का अनुमान है कि शायद स्कीम बनाने वाले ग्रुप में से कोई चाहता हो कि ये स्कीम औरों को पता लग जाये और हादसा होने से बच जाये. और कुछ लोगों का सोचना है कि ये चाल राजा के मंत्री रॉबर्ट की हो सकती है क्योंकि उसने अपने जासूस लगा रखे थे चारों तरफ. और कुछ लोगों का कहना है कि ये स्कीम रॉबर्ट ने ही कैथोलिक लोगों के संग मिलकर बनाई थी फिर उन लोगों को इल्जाम में फँसा दिया पत्र लिखकर. ताकि कैथोलिक लोगों के बिरुद्ध और भी सख्त कानून बनाये जायें. खैर, लार्ड मौंटीगल उस पत्र को लेकर राजा जेम्स के उसी खास मंत्री राबर्ट सेसिल के पास गये. और राबर्ट ने वो पत्र कुछ दिन बाद राजा को दिखाया.

पार्लिया मेंट की बिल्डिंग के हर कोने में छान-बीन की गई और स्टोररूम में गन पाउडर मिला. और वहाँ बाहर घूमते हुये एक व्यक्ति को भी राजा के सिपाहियों ने पकड़ लिया, जो गाइ फाक्स था. राजा ने उससे सवाल पूछे लेकिन गाइ ने अपना नाम जॉन जानसन बताया और अपने साथियों का नाम बताने से इनकार कर दिया..ताकि इतने समय में उसके साथी कहीं और भाग जायें. लेकिन उसके साथी भागने की वजाय और बागी हो गये. गाइ को राजा के लोग टावर आफ लंदन नाम की एक बिल्डिंग में ले गये जहाँ अपराधियों को कड़ी यातनायें दी जाती थीं. उसे भी बहुत बुरी तरह से यातना दी गई. हालाँकि उसने मारने का प्लान बनाया था किन्तु फिर भी कुछ लोगों ने उसकी बहादुरी की तारीफ की व तरफदारी की. बहुत से उसके साथी भाग गये और कुछ को गोली से उड़ा दिया गया जिनमें उनका लीडर राबर्ट भी था. बाकी को टावर आफ लंदन में बहुत बुरी तरह से यंत्रणा दी गई. कैद में रहते हुये कई लोगों ने दीवार पर अपने नाम खोदे..दो नाम आज भी दीवार पर देखे जा सकते हैं. और फिर 1606 में गाइ फाक्स के साथ उनको कत्ल कर दिया गया.

उस दिन के बाद बारूद से होने वाली दुर्घटना से बच जाने की खुशी में 5 नबम्बर के दिन को '' गाइ फाक्स डे '' नाम दे दिया गया. और यहाँ के लोग हर साल इसे खूब धूमधाम से मनाते हैं. खुशी में आधी रात तक खूब पटाखे फोड़े जाते हैं. लेकिन सुरक्षा का बहुत तगड़ा बंदोबस्त रखा जाता है. लोगों को घेरे के काफी दूर खड़े रहना होता है. और पटाखों की आवाज और रोशनी काफी दूर-दूर तक देखी जा सकती है.

HAPPY DIWALI TO ALL !...FROM LONDON.

Wednesday, 27 October 2010

करवा चौथ..या कड़वा चौथ ?

हाँ, अपने समाज का यह कड़वा सच है कि एक औरत ही पतिव्रता बन कर वफादार रहती है और पति से अगले सात जन्मों के बंधन के बारे में सोचती है. लेकिन पुरुष के मन में क्या है उसका पता उसे नहीं लग पाता. और वो शायद जानना भी नहीं चाहती. तो ये तो एक तरह से पति पर ज्यादती हुई कि उसकी पत्नी अगले सात जन्मों में भी उसी पर अपने को थोपना चाहती है, है ना ? अपने पति की असली इच्छा जाने बिना ही अगले सात जन्मों में भी उसी से ही चिपकी रहना चाहती है. आँख-कान बंद करके औरत यही करती आयी है अपने समाज में पतिव्रता बनने की कोशिश में. क्या ये दिखावा है..ढोंग है लोगों को अपने पतिव्रतापन को इस तरह से जताकर ? इन बातों पर जब गंभीरता से गौर किया तो मुझे यह सब लिख कर कहने की प्रेरणा मिली.

मानती हूँ, हर तरह के बिचार व व्यवहार के लोग हर जगह होते हैं..और आज की आधुनिकता में तो लोगों के बिचार लगातार बदल रहे हैं. पहली बात तो ये कि अगले जनम का क्या पता कि कौन क्या होता है और मिलता भी है या नहीं. लेकिन जहाँ चाहत व असली प्यार हो वहाँ तो ऐसी बातें करना अच्छी लगती हैं..वरना औरत अपने को एक तरह से वेवकूफ ही बनाती है इन सब बातों को करके व कहके. चलो मानती हूँ कि जो औरतें पूजा-आराधना करती हैं पति की लंबी उम्र व भलाई के लिये वो सही है किसी हद तक. लेकिन अगला जनम उसी के नाम !!!! WHO KNOWS ABOUT THAT ? पता नहीं दुनिया में कितने शादी-शुदा पुरुष शायद सोचते होंगे कि '' VARIETY IS THE SPICE OF LIFE '' तो फिर वो क्यों अपनी उसी वीवी की अगले आने वाले जन्मों में तमन्ना करने लगे, बोलिये ?

सुनी हुई बातें भी हैं लोगों से कि कितने ही शराबी पति इस दिन भी देर से आकर अपनी पत्नियों को भूखा-प्यासा रखते हैं. और अगर किसी बीमार औरत ने इंतज़ार करते हुये उसके आने की उम्मीद छोड़कर कुछ मुँह में डाल लिया कमजोरी से चक्कर आने पर तो पति आकर गाली- गलौज करता है और मारता है उसे कि '' तूने मुझे खिलाये बिना कैसे खा लिया..तेरी हिम्मत कैसे और क्यों हुई ऐसा करने की ? ''

मुझे पता है कि मेरे बिचारों के बिरुद्ध तमाम लोग बोलने को तैयार होंगे. फिर भी कहना चाहती हूँ कि अपने समाज की बातों को देख और महसूस करके मन में जो बिचार उठ रहे थे उन पर मैंने गौर किया. पर उन्हें किसी से डिसकस करते हुये डर लग रहा था तो अपनी बात कहने का ये तरीका सोचा मैंने कि शायद औरतों का ध्यान मेरी कही बात की तरफ कुछ आकर्षित हो सके. और इतना भी बता दूँ कि मैं इस '' करवा चौथ '' की प्रथा के विपक्ष में नहीं हूँ..मुझे बगावत करने का दौरा नहीं पड़ा है. किन्तु क्या उन रिश्तों में ये उचित होगा कि वो औरतें जो खुश नहीं हैं अपनी जिंदगी में अपने पतियों के संग..वो आगे के जन्मों में भी उन्हीं को पति के रूप में अवतरित होने के लिये कहें. अपनी समझ के तो बाहर है ये बात.

खैर, आखिर में इतना और कहना है कि इस बात पर हर औरत अपने आप गौर करे और समझे तो उचित होगा. मैंने तो सिर्फ अपने बिचार रखने की एक सफल या असफल कोशिश की है. और सोचने पर मजबूर होती हूँ कि ऐसे पतियों का साथ पत्नियाँ क्यों माँगती है अगले जन्मों में..वो भी सात जन्मों तक ? क्यों, आखिर क्यों..जब कि किसी भी जनम का कोई अता-पता तक नहीं किसी को ? और क्या फिर से यही अत्याचार सहने के लिये उन जन्मों का इंतजार ?????