Friday, 13 January 2012

मकर-संक्रांति की यादें और पतंगें

खुला मौसम गगन नीला

धरा का तन गीला- गीला l


पतंगों की उन्मुक्त उड़ान

तरु-पल्लव में है मुस्कान l


मकर-संक्रांति को भारत के हर प्रांत में अलग-अलग नामों से जाना जाता है. और वहाँ के वासी अलग-अलग तरीके से इस त्योहार को मनाते हैं. पंजाब में इसे लोहड़ी बोलते हैं जो मकर-संक्राति के एक दिन पहले की शाम को मनायी जाती है. और उत्तरप्रदेश में, जहाँ से मैं आती हूँ, इसे मकर-संक्रांति ही बोलते हैं. लोग सुबह तड़के स्नान करते हैं ठंडे पानी में. और इस दिन को खिचड़ी दिवस के रूप में मनाते हैं. यानि घर की औरतें एक थाली में उड़द की काली दाल, नये चावल, नमक, मिर्च, गुड़, घी व कुछ रूपया-पैसा रखती हैं और घर के आदमी लोग पुन्य प्राप्त करने हेतु उसे हाथ से छूते हैं, फिर उसे ब्राह्मणों को देते हैं.


बचपन की यादें भी क्या अजीब चीज होती हैं. कितनी अटरम-सटरम बातें याद आती रहती हैं. अक्सर उनकी भीड़ लग जाती है. आज फिर मकर-संक्रांति के अवसर पर वो यादें तरो-ताज़ा हो आईं. खिचड़ी और पतंगों का मनभावन त्योहार. लड़की होने के कारण पतंग उड़ाने की हसरत मन में ही रखते थे. कितनी सादगी भरा था वो बचपन. मूंगफली, लइया और चने झोली में रखकर खेलते हुये इधर-उधर गिराते हुये खाया करते थे. किसे परवाह थी स्टाइल और दिखावे की. मन भर कर कूदे-फांदे, कोई नाराज हुआ तो हो ले...कोई कान खींचे तो खींचने दो, कोई झुंझलाये तो झुंझलाने दो...थोड़ी देर बाद रो-मचल कर हम नार्मल हो जाते थे. माँ चिल्लाती रहती थी और हम कभी अधिक नोटिस नहीं करते थे कि उन्हें वैसा करने से रोकते. घर में ऊँची आवाज में बोलना...सारा दिन किसी न किसी बात पर चीख-पुकार सब नार्मल बातें थीं...

अर्रर्रर्र कहाँ से कहाँ पहुँच गयी मैं.


तो इस दिन केवल काले उड़द की दाल की खिचड़ी ही खाने में बनती है. आज फिर जैसे बचपन की यादों के टुकड़े बिखर कर पतंग की तरह उड़ने लगे हैं. कल्पना में अपने को मायके के बड़े से आँगन में देख रही हूँ. और वहाँ बिछी हुई गुनगुनी धूप में चारपाई पर थाली रखकर वो गरमागरम खिचड़ी (जिसमें अम्मा अपने प्यार के साथ-साथ ढेर सा देशी घी उंडेल देती थीं) धनिये की चटनी, अचार, मूली, दही और आलू के भर्ता के संग खाते हुये देख रही हूँ.


और यही मौसम रेवड़ी, गजक का भी होता है जिनका आनंद भरपूर लिया जाता है. गन्ने के रस की बहार का क्या कहना. ताज़ा रस आता था कोल्हू से निकल कर और उसे ठंडा-ठंडा पीते थे व माँ उसमें चावल डाल कर मीठी खीर भी बनाती थीं जिसे हम रसाउर बोलते थे. उसे वैसे ही खाया जाता है. लेकिन चाहो तो उसमे दूध अलग से अपनी श्रद्धानुसार डाला जा सकता है.


और फिर बारी आती थी पतंगों की. इस दिन पतंग बेचने वालों के यहाँ भीड़ लगी रहती थी...तरह-तरह के रंग और आकार की पतंगें, चरखी और मंझा...खूब बिक्री करते थे बेचने वाले. छोटे बच्चे छोटी व बड़े बच्चे बड़ी पतंगें पहले से ही इस दिन के लिये खरीद कर रखते थे और फट जाने पर जल्दी से और खरीद कर ले आते थे. बड़े जोर-शोर से कुछ दिन पहले से ही पतंगें उड़ाने की तैयारी होती थी. और छत पर जाकर खुले-खुले नीले आसमान के नीचे कुछ सिहरन देती हवा में पतंगें उड़ाते थे. चारों तरफ पतंगें ही पतंगें..जैसे रंग-बिरंगे रूमाल उड़ रहे हों. फिर कभी आपस में लड़ना, नाराजी में दूसरे की पतंग फाड़कर कलेजे को ठंड पहुँचाना, आँसू बहाना, मचल जाना इत्यादि तमाम कुछ होता था.


बड़े भाइयों के आदेश पर मंझा और चरखी पकड़ कर उनके पीछे-पीछे चलना, पतंग को पकड़ कर दूर किनारे पर जाकर उसे ऊपर हवा में छोड़ना, कोई गलती हो जाने पर उनकी डांट खाना और वहाँ से भगा दिये जाना. लेकिन फिर कुछ देर के बाद चैन ना पड़ने पर बेशरम की तरह फिर जाकर जिद करना कि हमें भी पतंग उड़ाने दो. लेकिन लड़की होने के कारण और उन भाइयों से छोटे होने के कारण हमारी दाल नहीं गलती थी. यानि हमको बड़ी क्रूरता से फटकार दिया जाता था ‘चल हट...तुझे पतंग उड़ाना आता भी है’ तो हमारी उमंगों पर पानी फिर जाता था और हम मुँह लटकाकर अपनी हसरत मन में दबाकर उन सबको पतंग उड़ाते हुये देखते रहते थे. लेकिन भाग-दौड़ के कामों में हमारा फुल उपयोग होता था. जैसे किसी और की पतंग काटने को उन्हें उत्साहित करना और कभी कोई पतंग पड़ोस की छत पर गिरी तो ‘जा पड़ोसी के छत पर पड़ी पतंग जल्दी से उठा ला’ या 'उस पपीते व अमरुद के पेड़ में फँसी हुई वो पतंग मुंडेर पर चढ़कर निकाल कर ले आ’ या ‘दूर वाले की पतंग उलझ गयी है और अपनी छत पर नीचे झुक रही है...तोड़ इसे..काट इसे’ आदि के शोर में शामिल होना. और उससे पहले ही यदि किसी और ने वहाँ पहुँचकर वो पतंग लपक कर उठा ली तो अपना सा मुँह लेकर हम वापस आ जाते थे. दिन डूबने तक आसमान को छूती हुई लहराती पतंगों में होड़ सी रहती थी कि किसकी पतंग खूब ऊँची और देर तक उड़ती है.


शाम तक पतंगों की रौनक रहती थी फिर सब लोग अपनी चरखी-मंझा समेटकर छत से नीचे आ जाते थे. और हम रात में सोने पर सपनों में चैन से उन पतंगों को उड़ाने की हसरत पूरी करते थे.


जल्दी में क्रिसमस की शुभकामनायें

क्रिसमस का त्योहार 25 दिसंबर को मनाया जाता है और उसके लिये तो अभी करीब एक महीना बाकी है. लेकिन यहाँ इंग्लैंड में क्रिसमस का वातावरण शौपिंग एरिया व दुकानों में देखते ही बनता है...तरह-तरह की चाकलेट, बिस्किट, केक, पुडिंग, फल, मेवा और सजावट की चीजें मार्केट में आ गयी हैं. हर जगह बड़ी रौनक है और जगह-जगह म्यूजिक चलता रहता है. लोगों की भीड़ से मार्केट सुबह से शाम तक पटे रहते हैं. बड़े-बड़े सुपरमार्केट रात देर तक..यानि 9-10 बजे तक खुले रहते हैं. लेकिन खरीदने वालों की भीड़ फिर भी कम नहीं होती. सुपरमार्केट के फ्रीजर तरह-तरह की आइसक्रीम, स्वीट डिशेस व पार्टी की स्वादिष्ट चीज़ों से और भी भरने लगे हैं. कपड़े-लत्ते व जेवर खूब बिक रहे हैं व दुकानों में माल लबालब भरा हुआ है. महंगाई का मुँह यहाँ भी बढ़ता जाता है फिर भी फैशनेबिल उपहार व कपड़ों को खरीदने का लोगों में पागलपन और बढ़ गया है. इनमे से न जाने कितने आइटम तो क्रिसमस के बाद पसंद ना आने का कारण बता कर दुकानों को लौटाये जायेंगे व कितने ही गिफ्ट्स charity में जरूरतमंद लोगों को दे दिये जायेंगे.


और क्रिसमस के दिन कितने ही ब्रिटिश लोग अपना traditional टर्की का डिनर पसंद न करके इटैलियन व चिकन टिक्का मसाला आदि खा रहे होंगे. आप सबको भी शायद पता होगा कि अब ब्रिटिश लोगों का ये फेवरेट फूड है. कुछ आलसी लोग या जो पार्टी के मूड वाले हैं वो घर पर खाना न बनाने की बजाय रेस्टोरेंट में जाकर खायेंगे. और तमाम ब्रिटिश लोग तो इस समय छुट्टियाँ कहीं गरम जलवायु वाले देशों में जैसे इटली व स्पेन में जाकर गुजारना पसंद करेंगे. कुछ लोग तो अब इस त्योहार से ऊबे-ऊबे से लगते हैं और कुछ लोग बच्चों की खातिर मनाते हैं. फिर भी इस दिन की लोग सभी बड़ी उत्सुकता से बाट जोहते हैं. और तो और अब इस उत्सव का आनंद लेने के लिये भारतीय भी पीछे नहीं रहते. इस अवसर पर दीवाली की तरह रोशनी की सजावट व क्रिसमस ट्री घरों में लगाकर रंग-बिरंगी चीजों से सजाते हैं. बाहर-भीतर लाइट की भरमार होती है और देखने काबिल होती है. और शाम को सड़कों पर कई जगह बिजली की खूबसूरत सजावट से बड़ी चहल-पहल रहती है. सेन्ट्रल लंदन में आक्सफोर्ड स्ट्रीट, रीजेंट स्ट्रीट व पिकडिली सर्कस नाम की जगहों में रोशनी की वो सजावट होती है कि दूर-दूर से लोग देखने आते हैं और टूरिस्ट लोगों की भीड़ लगी रहती है. रात तो दुल्हन की तरह दिखती है और शहर जैसे सोता ही नहीं.

एक दूसरे के त्योहार को देखने व उसमे भाग लेने में कितना मजा आता है..है न ? :)

स्थानापन्न मातृत्व (Surrogacy)

जब एक औरत के मन में माँ बनने की तीव्र इच्छा उठती है और वह बदकिस्मती से पूरी न हो पाये तो समय के साथ-साथ वह अहसास एक असहनीय आंतरिक पीड़ा का रूप ले लेता है. उस तड़प को केवल वही पति-पत्नी जानते हैं जो इस राह से गुजरे हों. और इस पर आप यह भी कह सकते हैं कि वो लोग किसी और के बच्चे को गोद क्यों नहीं ले लेते...तो उस दशा में भी काफी दिक्कतें आती रही हैं. विदेशों के लोग भारत भी जाकर बच्चों को गोद लेने की कोशिश करते हैं. तो कई बार लोगों की उम्र, रहने की परिस्थितियाँ, किसी का स्वास्थ्य, या विभिन्न जाति के पति पत्नी होने से समस्यायें आ जाती हैं.


उस स्थिति में आज की दुनिया में कुछ लोग माँ-बाप बनने का सपना किसी और का गर्भाशय उधार लेकर पूरा कर रहे हैं. उन्हें सरोगेसी ही उनके सपने पूरे होने का जरिया नजर आती है. और इस मुद्दे पर लोग अपने अलग-अलग बिचार प्रकट कर रहे हैं. किन्तु जो संतान के अभाव की पीड़ा को सहन कर रहे हैं वो किसी भी हद तक जाकर आसमां से सितारे तोड़ कर लाने का ख्वाब रखते हैं और कोशिश करने पर कुछ लोगों के ऐसे सपने पूरे भी हो रहे हैं. पति के स्पर्म (बीज) से पत्नी की ओवरी (अंडाशय से) अंडा निकालकर fertilise (गर्भाधान) करके किसी और औरत के गर्भाशय में डालकर संतान पैदा होती है. और कई ऐसे भी केस हो रहे हैं जहाँ पत्नी के अंडाशय में अंडा ही नहीं पैदा होता तो उस दशा में किसी से दान लिया हुआ अंडा इस्तेमाल किया जाता है.


अमेरिका और इंग्लैंड में तो ऐसे भी किस्से हो रहे हैं जहाँ कुछ औरतें अपनी सहेली की मनोदशा व असहायता को देख नहीं पायीं और उन्होंने अपना गर्भाशय उधार देकर उनके बच्चों को जन्म दिया. इस तरह का कार्य करके उन्हें शर्मिंदगी नहीं बल्कि गर्व महसूस हुआ कि वो किसी के काम आ सकीं.


और कुछ औरते आजकल केवल अपनी आर्थिक दशा सुधारने के उद्देश्य से सरोगेट माँ बनने को तैयार हो रही हैं. और इस तरह के उदाहरण अब पश्चिमी भारत में भी बहुत पाये जा रहे हैं जहाँ गरीब घरों की औरतें रिश्तेदारों की आपत्ति के वावजूद भी अपना घरबार, पति व बच्चों से सैकड़ों मील दूर जाकर एक क्लिनिक की तरफ से इंतजाम किये हुये घरों में रहकर किसी और के बच्चे को जन्म देती हैं. क्लिनिक उन औरतों के गर्भवती हो जाने पर उनका रहने और खाने का इंतजाम उन खास घरों में करती है. वो लोग अपने पति व बच्चों से दूर अपनी ही तरह की बच्चों को जन्म देने की प्रतीक्षित औरतों के ग्रुप में रहती हैं. और वहाँ सभी मेडिकल सुविधाओं के बीच बच्चे को जन्म देती हैं. और फिर जिनका बच्चा उनकी कोख में था उनको वो सौंप दिया जाता है.


विदेशी लोग इस काम के लिये क्लिनिक को जो पैसा देते हैं उसका करीब एक तिहाई हिस्सा यानि करीब £5000 बच्चे के सुरक्षित पैदा होने पर उस औरत को मिलते हैं. और हर महीने उनके खाने, फल व दवाइयों के नाम पर आकांछित माता-पिता उस औरत के लिये करीब £28 यानि करीब 2,000 रुपये अलग से देते हैं. कई औरतें उस पैसे से अपना घर बना रही हैं और परिवार की जिंदगी सुधार कर गर्वान्वित हैं कि वो किसी के काम तो आ ही रही हैं साथ में अपने घर की आर्थिक स्थिति सुधार कर अपने बच्चों की अच्छी और ऊँची शिक्षा का भी इंतजाम करके उनका भविष्य भी बना रही हैं. यहाँ उम्र और जाति का कोई सवाल नहीं उठता दिखता है. वो कहते हैं ना कि Beggars can’t be choosers…और दोनों ही पक्षों का भला हो जाता है. किसी की संतान की चाहत पूरी हो जाती है और किसी को अपनी जिंदगी की जरूरतों के लिये पैसे मिल जाते हैं. पैसे कमाने के बिचार से कुछ औरतें तो एक बार किसी के बच्चे को जन्म देकर फिर से दोबारा इच्छुक रहती हैं दूसरे बच्चे को जन्म देने के लिये भी.


शायद आप सोचते होंगे कि जिसने बच्चे को जन्म दिया है वो शायद जन्म देकर उसे सौंपने से मुकर जाये तो उन औरतों के सोचने का नजरिया ही फर्क हो जाता है. उनका सोचना है कि ये काम किसी के भले के लिये व अपने लिये पैसा कमाने को कर रही हैं और उनकी कोख में पलने वाला बच्चा उनका नहीं बल्कि किसी और का है...केवल अपना गर्भाशय उधार दे रही हैं. वो अपने को उस बच्चे के प्रति मातृत्व की भावनाओं से दूर रखती हैं यह सोचकर कि उनकी कोख में पलता हुआ बच्चा किसी और का है उनका नहीं क्योंकि उनका परिवार तो उनके वो बच्चे हैं जो घर पर उसका इंतज़ार कर रहे हैं. सुनने में आता है कि इस तरह जन्म देने वाली औरतों की अब कमी नहीं है भारत में...तमाम औरतें गरीबी व अशिक्षा के कारण इसे ही कमाई का जरिया समझने लगी हैं और इनकी अब क्लिनिक में लाइन लग रही है. कोई इस मुद्दे पर सहमत हो या ना हो पर क्लिनिक को इस तरह की औरतों पर नाज है जो ना केवल दूसरों के संतान पाने के सपने पूरे करती हैं बल्कि ऐसा करने से अपनी गरीबी दूर करने के सपने को भी पूरा कर पाती हैं...और उन्हें खुद पर बहुत गर्व होता है.


अब एक सवाल उठता है कि इस तरह के बच्चों को बड़े होकर जब उनके जन्म की कहानी उनके माता-पिता सुनायेंगे तो उनपर क्या प्रतिक्रिया होगी. किसी में अपने माँ-बाप दोनों का अंश होगा तो किसी में एक का...पर जिसने उसे अपनी कोख से जन्म दिया है क्या उसके बारे में भी वो जानना चाहेगा या उसे देखना चाहेगा और किस तरह के भाव आयेंगे उसके मन में ?


शायद आप सब के मन में भी यही बिचार छेड़खानी कर रहे होंगे. लेकिन वर्तमान में किसी का सपना तो साकार हुआ. पर उन्हें भविष्य में कई सवाल भी लटके नजर आते होंगे.

आप सभी मित्रों के बिचारों का यहाँ स्वागत है.

बचपन एक कहानी

आज अचानक हरिद्वार की बहुत याद आ गयी. तो आइये आज आप सबको कुछ अपने बचपन की तमाम यादों से जरा सा अंश एक कहानी की तरह सुनाती हूँ ...सुनोगे आप सब..? क्या कहा, हाँ...


तो ये बहुत समय पहले की बात है जब मैं छोटी थी व स्कूल में पढ़ती थी. तब मेरे बुआ-फूफा जिन्दा थे. उन लोगों ने सारी जिंदगी वहीं हरिद्वार में ही गुजारी और उनके बच्चे-उच्चे भी वहीं पढ़े-लिखे. फूफा जी वहीं भल्ला कालेज में प्रिंसिपल थे. दादूबाग के पास रहते थे. जब उन लोगों के पास गरमी की छुट्टियों में जाते थे तो हम बच्चों की पूरी टीम हरकीपौड़ी पर शाम को घूमने जाती थी व कुलचे, भटूरे और आलू की टिक्की का भरपूर आनंद लेते थे :) गंगा के पानी में मछलियों को आटे की गोलियाँ भी फेंककर खिलाते थे और कभी-कभी गंगा में डुबकी मार कर सब नहाते भी थे. और जहाँ पर घर था वहाँ पास में छोटी सी एक नहर थी तो हर सुबह तौलिया और कपड़े उठा के हम सभी नहाने के लिये उछलते-कूदते जाते थे और रस्ते में सड़क के किनारे लगे लाल-पीले जंगली फूलों को तोड़ते और सूंघते हुये एक दूसरे पर फेंकते और खिलखिलाते थे. दादूबाग के बागीचे से लीची और लोकाट भी सभी बच्चे चोरी किया करते थे. पकड़े जाने पर कहते थे कि जमीन पर से उठाये हैं. कभी-कभी लक्ष्मण झूला भी सब मिलकर दिन की ट्रिप में जाते थे. वहाँ उस हिलते पुल पर से गुजरना..सोचकर अब भी रोमांच सा होता है. और दूर पहाड़ी पर चंडी माता के मंदिर में सीढ़ियाँ चढ़कर दर्शन करने को भी जाते थे.


Friday, 26 August 2011

एक ही संतान..तो ?

आजकल पति-पत्नी शादी के बाद बच्चों के बारे में खुद फैसला करते हैं कि परिवार की साइज कितनी बड़ी होनी चाहिये...यानि प्लानिंग कितने सालों की हो और कितने बच्चे उन्हें चाहिये. अपने बच्चे सबको खुद पालने पड़ते हैं तो उन्हें पैदा करने के बारे में किसी के कहने पर क्यों निश्चय करें. आप सबको ये जानकर आश्चर्य होगा कि आजकल पश्चिमी देशों में कुछ लोग तो चाइल्ड-फ्री रहने का इरादा रखते हैं. खैर, परिवार के बारे में कभी-कभी तो लोग चाहते हैं एक से दो या अधिक बच्चे किन्तु कभी-कभी कुछ लोगों की किस्मत में एक से अधिक बच्चा नहीं लिखा होता है तो उन्हें एक से ही संतोष करना पड़ता है. उन लोगों पर ''नहीं से कुछ भला'' वाली बात लागू हो जाती है. तो समाज में जहाँ ऐसे लोग हैं वहीं वो लोग भी हैं जो एक से अधिक बच्चा ही नहीं चाहते हैं.

और उस औरत के बारे में भी यही बात थी. उसके एक बेटा था और वह व उसका पति दोनों ही एक बच्चे से संतुष्ट थे...दोनों ही खुश थे. किन्तु समाज के लोगों को चैन नहीं पड़ता है..उन्हें दखलंदाजी करने की आदत जो होती है. इसलिये उन दोनों को आये-दिन ही लोगों की तरह-तरह की बातें सुननी पड़तीं थीं. लोगों के सवाल का सामना करना पड़ता था: ''कितने बच्चे हैं तुम्हारे ?'' और ''केवल एक'' सुनकर उनकी भौहें चढ़ जाती थीं जैसे उनका कोई व्यक्तिगत नुकसान हो गया हो. और जब उन्हें पता लगता था कि वह बच्चा नौ साल का है तब तो उनको जैसे दहशत सी हो जाती थी सोचकर कि अब तक दूसरा क्यों नहीं हुआ. ''ओह ! केवल एक'' कहकर बड़ी रंजिश व्यक्त करते हुये साँस खींच कर रह जाते थे. उस औरत को तो लोगों से मिलते हुये भी डर लगता था. वह दोनों ही पति-पत्नी काम करते थे और अपने बच्चे को बहुत प्यार करते थे...उनका बेटा उनकी खुशियों का केंद्र था फिर भी वह दूसरे बच्चे के बारे में सोचना नहीं चाहते थे. पर इस बात को तमाम लोगों को समझाना बहुत मुश्किल था.

मौका मिलने पर तमाम अजनबी लोग और जिन औरतों के कई बच्चे होते थे वह भी उसके इकलौते बच्चे के बारे में जानकर आश्चर्य प्रकट करके ''अकेला एक'' कहकर उस औरत को अजीब निगाह से देखते थे. यहाँ तक कि पार्टी में एक बार उन पति-पत्नी को उनके एक मित्र ने उपदेश दिया कि उन दोनों को इतना स्वार्थी नहीं होना चाहिये जब कि वह आदमी खुद तलाकशुदा था और अपने बच्चों के साथ नहीं रहता था. ऐसी बातों को झेलकर वह सोचा करती थी कि उन लोगों का क्या हाल होता होगा जो जिंदगी भर बच्चों के ववाल में नहीं पड़ना चाहते. क्यों नहीं लोग खुद चैन से जीते हैं और दूसरों को भी चैन से जीने देते हैं इस दुनिया में.

उसके बिचार से जिनके कई सारे भाई-बहिन होते हैं उनमें अक्सर लड़ाई-झगड़े व आपस में प्रतिस्पर्धा भी हो जाती है अगर परिवार में कोई बच्चा अधिक फेवरिट हो तो. लेकिन उनका अकेला बच्चा होने के कारण किसी अन्य बच्चे के फेवरिट होने का सवाल ही पैदा नहीं होता और वह अपना पूरा प्यार व ध्यान उसी पर दे रहे हैं. उनका बेटा ना बड़ा, ना मंझला और ना ही कभी छोटा कहलायेगा..और वह एक इंसान है ना कि नंबर जहाँ सोचना पड़े कि वह सब बच्चों में किस नंबर पर आता है. किन्तु ऐसी बातें वह अधिक बच्चों वाली माँओं को नहीं बता सकती थी क्योंकि उन सबका अधिक बच्चे पैदा करने का अपना निश्चय था और ये सचाई सुनकर उन्हें बुरा लग सकता था. इसलिये अपने मन में ही ये बातें रखती थी. वह पति-पत्नी दोनों ही खुश थे क्योंकि ये उनका आपस का फैसला था सिर्फ एक बच्चे के बारे में किन्तु वह ऐसे लोगों के बारे में भी जानती थी जहाँ पति-पत्नी में से एक को तो अधिक बच्चे चाहिये पर दूसरे को नहीं और तब उनकी शादी-शुदा जिंदगी में बहुत समस्यायें आती होंगी, क्योंकि इससे एक का दिल टूट जाता है.

उन दोनों के करीबी मित्र उनके फैसले की कद्र करते हैं लेकिन विस्तृत रूप से समाज का दबाब ऐसे लोगों के लिये एक सिर दर्द बना हुआ है. कई लोग तो उनसे ये भी पूछते हैं कि अगर लड़की होने की गारंटी हो तो क्या वह लोग दूसरा बच्चा चाहेंगे. क्योंकि लड़कियाँ अपने माता-पिता को अधिक प्यार करती हैं..माँ के साथ में शोपिंग जाना, घर के काम में हाथ बंटाना आदि-आदि. लेकिन अगर सोचें तो कब तक ये बातें भी खुशी देंगी...आजकल जमाना बदल गया है. बड़े होकर बेटा-बेटी सभी बच्चे मूडी हो जाते हैं और एक दिन सभी अपनी-अपनी अलग जिंदगी जीने लगते हैं चाहे वो बेटा हो या बेटी. दोस्तों के संग आउटिंग जरूरी होती है ना कि माँ के साथ घर के काम में हाथ बंटाना. तो बेटा या बेटी में क्या फर्क ? और जहाँ तक उनके बेटे के बचपन में बहिन-भाइयों के साथ खेलने की बात है तो उसके साथ खेलने वाले उसके तमाम दोस्त हैं जिनसे उसे अकेलापन नहीं महसूस होता. स्कूल से सम्बंधित व और कई सारी एक्टिविटीज में उसे तमाम दोस्तों का साथ मिलता है. और उसे घर में अपने खिलौनों को खेलते हुये किसी और से झगड़ा भी नहीं करना पड़ता.

घर में अपने माता-पिता के साथ बोर्ड गेम खेलना, टीवी देखना, बातें करना, बाहर आउटिंग पर जाना और उनसे शिक्षा सम्बंधित बातों में सहायता मिलना आदि बातों से वह अकेला कहाँ महसूस कर पाता है. और सबसे बड़ी बात तो यह है कि परिवार की साइज़ एक बहुत ही व्यक्तिगत मामला है जिसमें दखल देने का किसी को हक नहीं होना चाहिये. फिर भी न जाने क्यों ऐसी कहानियाँ हम सभी सुनते रहते हैं जहाँ लोग विवेचना करते रहते हैं कि किसी का परिवार छोटा या बड़ा क्यों है ? उस औरत की समझ में नहीं आता कि अगर कोई खुश है अपनी जिंदगी में तो किसी अजनबी को क्यों बेचैनी होती है जानकर कि किसी के एक ही संतान क्यों है. इसपर आप लोगों का क्या मत है ?


बैजिल (Basil) का उपयोग व इससे लाभ

पेट भरकर स्वस्थ्य रहकर जीने के लिये हम अपने जीवन में खाने में तमाम तरह के फल व ताज़ी और हरी-भरी सब्जियाँ का उपयोग नितदिन करते हैं. और उन सभी से हमारे शरीर को पौष्टिक पदार्थ मिलते हैं. खाने में उन्हें कई बार खाते हुये हम जान नहीं पाते कि उनमें से कुछ चीजें कितनी गुणकारी होती हैं. यहाँ आज मैं आपका परिचय एक बूटी से करा रही हूँ जिसका नाम है ‘’बैजिल’’ और जो शायद मूल रूप से भारत और फारस में जन्मी है, परन्तु बिदेशों में उसका उपयोग खाने में बहुत हो रहा है, खास तौर से इटली में या कहिये कि इटैलियन खाने में. भारत में शायद उसका उपयोग औषधि के रूप में ही लोग जानते रहे हैं. तो आइये इसके बारे में कुछ बताती हूँ:


''बैजिल'' एक बहुत अच्छी खुशबूदार बूटी है. जो पोदीना के पत्तियों जैसी ही दिखती है और उसी के परिवार की कहलाती है. इसे इसका नाम ग्रीक देश ने दिया है जिसका मतलब होता है ''राजा'' या ''शाही'' और ये खासतौर से इटली में बहुत उगाई जाती है और वहाँ के खाने में इसका उपयोग हर दिन के खाने में बहुत होता है. लेकिन अब इटैलियन खाने और भी देशों में भी बनने लगे हैं. टमाटर से बनी खाने की चीजों में इसका बहुत इस्तेमाल होता है. इसे ओलिव आयल व टमाटर के साथ पकाकर इसकी सौस बनाकर पिज्जा और पास्टा में इस्तेमाल करते हैं. इसकी बहुत किस्में होती हैं और हर किस्म का अपना खास स्वाद होता है. बैजिल सुपरमार्केट में ताज़ा या सुखाकर बेचा जाता है. वैसे चाहें तो इसे बड़ी आसनी से घर में भी धनिया और पोदीना की तरह उगाया जा सकता है.


इस बूटी का बहुत पौष्टिक महत्व होता है और बहुत गुणकारी है. इसे और बूटियों की अपेक्षा काफी मात्रा में भी खा सकते हैं. इसमें आयरन, कैल्शियम, पोटैसियम और विटामिन सी पाये जाते हैं जो अच्छे स्वास्थ्य के लिये बहुत जरूरी हैं. इसमें छोटी मात्रा में विटामिन ए भी होता है. इसको सैंडविच, सूप, सलाद में खाते हैं व सब्जियाँ बनाते समय उनमे भी प्रयोग कर सकते हैं. इसे पानी में उबाल कर जरा सी चीनी डालकर मिंट-टी की तरह पीने से बड़ी राहत मिलती है. वैसे इसकी टी कभी भी पी सकते हैं.


इसके बारे में कुछ औषधीय जानकारी से भी अवगत कराना आवश्यक है. ये राहत देने वाली शांतिकारी औषधि के रूप में पहचानी जाती है. घबराहट होने पर या पाचक-शक्ति ठीक ना होने पर लाभदायक है. इसके सेवन से तमाम और भी फायदे हैं जिनके बारे में भी जानकारी लीजिये:


1.श्वांस से सम्बंधित बीमारियों में जैसे खांसी और फेफड़ों की सूजन होने पर.

2. जुकाम व फ्लू के आसार में.

3. कई प्रकार के वैक्टीरिया को बढ़ने की रोकथाम में.

4. शरीर के कोषों को आक्सीकरण व हानि से बचाने में.

5.गठिया के रोग में प्रदाहनाशी साबित होती है. उसे आगे बढ़ने से रोकती है.

6.शरीर में रक्त-प्रवाह में सुधार होता है व मांसपेशियों और नसों को राहत मिलती है.

7.दिल की बीमारियों को होने से रोकती है.

8.खाने में पाचनशक्ति में सहायता करती है.

9.पेट की मरोड़ व दर्द दूर करने में फायदेमंद.

10.घबराहट, चिंता, उदासी व थकान दूर करती है.

11.माइग्रेन यानि आधे-सिर के दर्द में फायदेमंद होती है.

12.कीड़े-मकोड़े इससे दूर रहते हैं.

13.कीड़े के काटने पर इसे इस्तेमाल करने पर लाभ होता है.

14.और अनिद्रा की हालत में लाभकारी साबित होती है. इसे उबालकर चाय की तरह पीजिये.


''बैजिल’'' के इतने फायदे जानकर अब आप लोग भी इसका कभी-कभार सेवन करें और इसके स्वाद के साथ-साथ स्वास्थ्य-सम्बंधित लाभ भी उठायें.


मैं दुखियारों का कूड़ेदान (आप बीती)

मेरी बिना नाम की काल्पनिक सहेली,


आज मैं तुम्हें फेसबुक की तमाम बातों में से एक दुख का राज बता रही हूँ. वैसे ना बताती किन्तु अब कुछ मेरे साथ इन्तहां हो रही है. बिन बुलाये हुये मेहमान की तरह औरों के दुखों को झेलकर उनपर मलहम लगाने का मैं इनाम पा रही हूँ. तो सुनो....बताती हूँ...

मैं अपने दिल का दर्द संक्षेप में बता रही हूँ कि फेसबुक पर कुछ लोग मेरे सीधेपन का नाजायज फायदा उठाकर मेरे लिये रेस्पेक्ट दिखाते हुये इन्बोक्स में आकर पहले किसी की बुराई करते हैं और वादा करवाते हैं कि मैं किसी से कभी कुछ ना कहूँ उस राज के बारे में और फिर उसके बाद उसी दोस्त से दोबारा मेल हो जाने पर मुझे ही उपेक्षित कर देते हैं. उनमे से एक दोस्त 'वो' भी थी.


थी इसलिये कि अब या तो मुझे ही बिना कोई कारण बताये उसने ब्लाक कर दिया है या शायद अपने को ही deactivate कर लिया है फेसबुक से ऊबकर. मुझे आज केवल उसका भूत दिखा...प्रोफाइल गायब. कहीं नहीं मिली फेसबुक पर. खैर, कारण जो भी रहा हो लेकिन परसों तक तो मुझे अपना हमराज मानकर अपना दुख बता रही थी कि किसी दोस्त ने उसे अपनी फ्रेंड-लिस्ट से निकाल दिया है क्योंकि वह उस दोस्त का कोई पर्सनल राज जान गयी थी. (वो कारन मैं आप किसी को भी नहीं बता सकती क्योंकि मैंने उससे वादा किया है किसी को भी न बताने का) उसका दुख सुनकर मैंने काफी तसल्ली दी उसे समझाते हुये कि वह कोई चिंता ना करे. किसी इंसान पर कोई जोर नहीं होता..और शायद उसके दोस्त की नाराजी कुछ समय की ही हो. और मेरी सम्भावना सही निकली. क्योंकि परसों उसने बताया कि उसके दोस्त ने फिर से उसे अपनी लिस्ट में शामिल कर लिया है.


लेकिन आज अभी कुछ देर पहले मुझे पता लगा कि उसने मेरा इस्तेमाल करके मुझे ही ब्लाक कर दिया है. Now I am really getting sick of this sickly behaviour from people on facebook. They use my shoulder to cry on and pour their misery over me and when things start looking up for them they dump me without any explaination. It's disgusting and shameful as after cofiding in me they make me promise to keep their secrets forever in my heart and when they decide to dump me they don't even think that I deserve an explaination from them...it really hurts. That's why I am not keen now to make anymore friends and have been turning down hundreds of requests. I can't trust people here...they scare me now. So I am considering to have some break from facebook for a little while until I feel comfortable to come back. It's not that I don't care about people or friendship...it's their selfish nature I hate.

प्राण जायें पर धन नाहीं

प्राण जायें पर धन नाहीं, औरन की फिकर कछु नाहीं ....

कितने दुख की बात है कि अपने ही देश के लोग धन के लालच में इतना होश खो चुके हैं कि चाहें उनके ही देश का हित करने वाले की जान तक चली जाये. अंग्रेजों ने जब देश पर शासन किया था अपना उल्लू सीधा करने के लिये तो उन्हें बुरा-भला कहते हैं लोग अब तक. ठीक है वो तो पराये थे लेकिन अपने देश के लोग खुद इतने स्वार्थी बन रहे हैं कि देश के अन्य लोगों के हित में अनसुनी करके कान में तेल डाल लिया है. हाय रे मानव हृदय ! कितनी शर्मनाक बात है...किसी ने भी ख्याल नहीं किया कि बाबा अपनी जान से भी हाथ धो सकते थे अगर उन्होंने अनशन ना तोड़ा होता. उनके उपवास से उनके जीवन-मरण का सवाल पैदा हो गया पर जिनके हृदय पिघलने चाहिये थे वो पाषण ही बने रहे. क्या इसी दिन को देखने के लिये आजादी चाही थी ? इस देश में लोग सिर्फ सपनों में रह कर बातें करते हैं..असल में सबको अपनी-अपनी फ़िक्र है..सारे देश की नहीं. जो भी देश के लिये आगे बढ़कर कुर्बानी देने को तैयार होता है उसकी बलि लेने को तैयार हो जाते हैं लेकिन उसके एवज में कुछ करना नहीं चाहते. सिर्फ दिखावे के लिये दूसरे देशों के आगे बड़ी-बड़ी देश-प्रेम की भावनाओं की बातें करते हैं. अरे, देश तो इसमें रहने वाले इंसानों से ही बनता है. लगता है कि भारतवासियों के मन में ही देश-प्रेम की ज्वाला भडकती है..उनके कर्मों में नहीं.

आशा है कि अब बाबा की हालत में और सुधार आया होगा....


Sunday, 5 June 2011

धूम्रपान से छुटकारा

देखा जाये तो धूम्रपान करना आमतौर से लोगों की एक आदत है. किसी न किसी कारण से वो लोग पीना शुरू कर देते हैं और फिर पता ही नहीं चलता कि कब वो स्मोकिंग के बुरी तरह से आदी हो गये. कितने ही लोग सोचते भी हैं इस आदत को छोड़ने को लेकिन उन्हें ये पता नहीं होता कि इससे निजात पाने के लिये क्या करना चाहिये.


जो लोग धूम्रपान करते हैं वो कुछ देर को जरा कल्पना करके देखें कि यदि वो स्मोकिंग करना बंद कर दें तो उसी दिन से उनके जीवन में परिवर्तन आना शुरू हो जायेंगे..उनकी बेहतरी के लिये उनकी पूरी जिंदगी ही बदल जायेगी. फेफड़ों में कैंसर का खतरा कम व बलगम बनना भी कम हो जाता है, हार्ट अटैक के चांस बहुत कम हो जाते हैं, मानसिक तनाव में कमी व साँस लेने में आसानी हो जाती है. स्मोकिंग बंद करने के 48 घंटे बाद ही आप बदलाव महसूस करने लगेंगे और आपका शरीर निकोटिन से मुक्त हो जायेगा.


इंग्लैंड में हजारों लोगों ने धूम्रपान छोड़ दिया है. लेकिन उस मंजिल तक पहुँचने के लिये सबको एक सी ही राहों से गुजरना पड़ा. स्मोकिंग से छुटकारा पाने की कोशिश करते हुये कई लोगों का संकल्प टूट जाता है और वो दोबारा स्मोकिंग करने लगते हैं लेकिन इसमें चिंता करने की बात नहीं है. क्योंकि अक्सर कुछ लोग 4-5 बार की असफलता के बाद भी प्रयास करते हुये हमेशा के लिये सिगरेट पीना छोड़ देते हैं. जिस तरह एक बच्चे के कदम लड़खड़ाते हैं पर कोशिश करते-करते संभल जाता है और फिर अच्छी तरह से चलने लगता है बस ऐसा ही स्मोकर्स के साथ भी होता है.


जरा इन बातों पर गौर कीजिये:


1. स्मोकिंग छोड़ने के बारे में सबसे पहले तो आप ये निर्णय लीजिये कि आप इसके बारे में गंभीरता से सोच रहे हैं और आपका संकल्प पक्का है. एक-एक कदम बढ़ाते हुये ही आप सफलता की पूरी सीधी चढ़ पायेंगे. और पहले से प्लान करिये कोई एक दिन जब आप उस दिन बिलकुल भी स्मोकिंग नहीं करेंगे.


2. अगर आप किसी और को भी जानते हैं जो स्मोकिंग करता है तो उसे भी आप साथ देने को कह सकते हैं एक दूसरे का सहारा पाकर इस आदत को छोड़ना और आसान हो जायेगा.


3. स्मोकिंग से विच्छेद करते हुये लोगों को अजीब-अजीब आसार (withdrawal symptoms) महसूस होते रहते हैं जिनका मुकाबला करने के लिये शुरू में निकोटिन-फ्री प्रोडक्ट का उपयोग करना चाहिये.


4. जहाँ लोग स्मोकिंग कर रहे हों तो वहाँ जाने से अपने पर कंट्रोल करिये ताकि आपको फिर कहीं तलब ना लगने लगे.


5. ये सोचिये कि जो पैसा आप सिगरेट आदि पर खर्च करते हैं उसे बचाकर अपनी किसी और अच्छी जरूरत में लगा सकते हैं.


6. और सबसे बड़ी बात ये कि अपनी इच्छा शक्ति को प्रबल रखते हुये मन को समझाइये कि अगर और तमाम लोग स्मोकिंग की आदत छोड़ने में सफल हो सकते हैं तो आप भी वैसा कर सकते हैं. ‘’बस एक सिगरेट और’’ के बारे में बिलकुल ना सोचें. अपने पास कोई सिगरेट, दियासलाई या लाइटर ही न रखें.


लेकिन खाली संकल्प-शक्ति से भी काम नहीं चलता है तमाम लोगों का. तो उस परिस्थिति में सहायता करने के लिये निकोटिन रिप्लेसमेंट थेरापी (NRT ) का सहारा लें. मार्केट में निकोटिन की एवज में तमाम प्रोडक्ट हैं जिनसे लोगों को निकोटिन की तलब से छुटकारा मिलता है, जैसे कि पैच (पट्टी), चुइंगम और इन्हेलेटर्स. इन चीजों का उपयोग करने के वावजूद भी यदि ग्रुप थेरापी को भी ज्वाइन कर लें तो सफलता के चांस और भी बढ़ जाते हैं. ग्रुप में लोग आपस में अपना अनुभव बांटते हैं और धीरे-धीरे इस आदत को छोड़ने का प्रोत्साहन व हिम्मत जुटाते हैं. सिगरेट छोड़ने की शुरुआत करते हुये पहले कुछ दिन बहुत मुश्किल होते हैं फिर तलब धीरे-धीरे कम होने लगती है.


मार्केट में ये प्रोडक्ट उपलब्ध हैं:


1. निकोटिन गम (Nicotine Gum): इन्हें चबाकर मुँह के अंदर साइड में रखा जाता है और निकोटिन धीरे-धीरे जीभ के जरिये अंदर पहुँचती रहती है.


2. निकोटिन पैच (Nicotine Patch): ये पेबंद या टेप की तरह होते हैं जिन्हें शरीर पर लोग दिन में या 24 घंटे भी लगाये रह सकते हैं. बहुत लोगों का अपने अनुभव से कहना है कि उन्हें निकोटिन पैच से बहुत मदद मिली, बिना उसके प्रयोग के शायद वो स्मोकिंग ना छोड़ पाते.


3. इन्हेलेटर्स (Inhalators): ये एक प्लास्टिक सिगरेट की तरह होते हैं जिनसे निकोटिन भाप के रूप में मुँह व गले में पहुँचता है.


4. जाइबान (Zyban): इन टैबलेट्स को स्मोकिंग छोड़ने के 1-2 हफ्ते पहले से लेना शुरू करते हैं. अचानक स्मोकिंग छोड़ने पर जो आसार (withdrawal cravings) होने लगते हैं वो इससे कम होते हैं. और ये इलाज करीब दो महीने तक चलता है.


5. चैम्पिक्स (Champix): जाइबान की तरह ही इन टैबलेट्स को भी स्मोकिंग छोड़ने के 1-2 हफ्ते पहले लेना होता है और ये सिगरेट पीने पर उसकी तलब को मिटाती हैं. इसका इलाज करीब 12 हफ्ते तक चलता है.


स्मोकिंग छोड़ने के यत्न में जो अजीब-अजीब आसार (withdrawal symptomps) महसूस होते हैं वो ये हैं:


1.धूम्रपान की बहुत तीव्र इच्छा: क्योंकि दिमाग को निकोटिन की चाहत होती है. कुछ दिनों तक बुरी तरह से तलब होती रहती है फिर धीरे-धीरे कम होने लगती है.


2.मुँह में सूखापन व खांसी का आना: ये फेफड़ों में तारकोल की अचानक कमी से होता है. लेकिन ये आसार जल्दी ही गायब हो जाते हैं. गरम पेय पदार्थ सेवन करें.


3.भूख: शरीर में खाना पचाने की रस प्रक्रिया (मेटाबोलिस्म) में बदलाव आता है. स्मोकिंग बंद करने के बाद खाने का स्वाद अच्छा महसूस होने लगता है. अधिकतर फल और सब्जियाँ खायें व पानी खूब पियें. और चुइंगम चबायें.


4. कब्ज व दस्त आना: ये निकोटिन शरीर से निकलने की प्रक्रिया में होता है. क्योंकि शरीर अपनी सामान्य अवस्था में लौटने की कोशिश कर रहा है. फलों व पानी का खूब पीना जारी रखें.


5.सोने में परेशानी: ये भी शरीर से निकोटिन निकलने की प्रक्रिया से होता है. 2-3 हफ्ते लगते हैं स्थिति को सामान्य होने में. चाय व कॉफी का उपयोग कम कर दें और ताजी हवा में कुछ समय बितायें.


6.चक्कर आना: क्योंकि कार्बन मोनोकसाइड की जगह दिमाग में अब आक्सीजन पहुँच रहा है. कुछ दिनों बाद सब ठीक महसूस होने लगता है.


7. मिजाज में बदलाव, चिड़चिड़ापन और ध्यान में कमी: ये आसार भी निकोटिन की कमी हो जाने से महसूस होते हैं पर कुछ दिन में चले जाते हैं. परिवार व मित्रों को इस बदलाव के बारे में बुरा ना मानकर समझदारी से काम लेना चाहिये.


एक बार स्मोक फ्री हो जाने पर अपने में बदलाव महसूस करते हुये आप अपने अतीत को याद कीजिये तो खुद आपको बिश्वास नहीं होगा कि आपने कितना समय, ताकत और पैसा कभी अपनी स्मोकिंग की आदत पर फेंका था. साथ में हर समय स्वास्थ्य का खतरा भी मंडराता था. स्मोक फ्री होने का मतलब है: आपकी आपसे एक नयी पहचान.

धूम्रपान की लत

''चिमनी सी वो धुआँ उगलती जाय

ना छूटे रामा लत सिगरेट की हाय.''


मुझे पता है कि सिगरेट पीने वाले कुछ मित्र इस लेख को पढ़कर मुझसे नाराज हो जायेंगे...किन्तु मेरा किसी को नाराज या दुखी करने का इरादा नहीं है. बल्कि मैं उन सभी की शुभचिंतक हूँ.


सिगरेट पीना ना केवल पीने वाले के लिये हानिकारक है बल्कि जो लोग सिगरेट नहीं पीते उनका ऐसे लोगों से सोशल होना भी बहुत मुश्किल हो जाता है. और चाहें वो कई बार पास में बैठकर सिगरेट न पियें कुछ देर के लिये फिर भी उनके पास बैठने व बातचीत करने पर धुयें की महक आती रहती है. और ऐसे लोगों को जब पीने की तलब लगती है तो फिर वह पीने से रुक नहीं पाते. कुछ मेहमान या दोस्त ये जानते हुये भी कि मेजबान व उसका परिवार स्मोकिंग नहीं करता घर के अंदर पीने से नहीं चूकते और मेजबान चुपचाप मन में कुढ़ते हुये बर्दाश्त कर लेते हैं.


काफी पहले ऐसे लोगों के साथ बस, ट्रेन या प्लेन में यात्रा करने पर बैठना मुश्किल हो जाता था. क्यों उस समय ऐसे कोई रूल्स नहीं बने थे कि वह लोग वहाँ सिगरेट नहीं पी सकते. लेकिन जो नहीं पीता है अगर उसे कभी किसी स्मोकर के पास की सीट पर बैठना पड़े तो बहुत सरदर्द हो जाता है. फिर एक समय आया कि बस, ट्रेन और प्लेन में स्मोकर्स के अलग कम्पार्टमेंट कर दिये गये. लेकिन धुयें को उड़ने से तो मना नहीं कर सकते तो जिन लोगों को पास की पंक्ति में बैठना पड़ता था तो धुआँ उन तक उड़ता हुआ पहुँच जाता था और वो लोग फिर भुनभुनाते थे. कई बार जब अन्य लोग उनसे ऊब कर वहाँ सिगरेट ना पीने को कहते थे तो इस बात पर पीने वालों की जिद से लड़ाई-झगड़ा तक हो जाता था. क्योंकि वहाँ धूम्रपान ना करने के कोई रूल्स ना होने के कारण पीने वाले परिस्थिति का नाजायज फायदा उठाते थे. इसी तरह आफिस में भी सिगरेट पीने वालों को न पीने वाले लोग बर्दाश्त करते थे और कभी-कभी उनमे झक-झक भी हो जाती थी. आपस में तनाव की रेखायें खिंच जाती थी; काम करते हुये लोगों की भौंहों पर बल पड़े रहते थे...लेकिन सिगरेट स्मोकर फिर भी दीन दुनिया की परवाह किये वगैर धकाधक सिगरेट पीते रहते थे. सुपरमार्केट जैसी जगह में भी पीने वाले नहीं मानते थे. शापिंग ट्राली के संग टहलते हुये सिगरेट को फुकफुक करना जैसे अनिवार्य था उनके लिये.


अब समय के साथ करीब हर जगह इस समस्या का समाधान हो गया है. ट्रेन, प्लेन, बस, आफिस, सुपरमार्केट, थियेटर व सिनेमा के अंदर धूम्रपान करने की सख्त मनाही है वरना बहुत भारी हर्जाना ठुकने का डर रहता है. हर जगह आफिस में भी अब सख्त मनाही है पीने की. और काम करने वालों को जब तलब होती है सिगरेट फूँकने की तो वह अपनी तमन्ना आफिस की बिल्डिंग के बाहर जाकर पूरी करते हैं या फिर बिल्डिंग में कहीं उनके लिये एक अलग कमरा होता है जहाँ जाकर जी भर कर पीते हैं और कलेजा ठंडा करते हैं (जलाते हैं) अगर कोई धोखे से भी उस कमरे में पहुँच जाये तो ऐसा लगेगा कि जैसे मौत की सजा झेलने के लिये किसी गैस-चैम्बर में घुस गये हों.


बहुत बार जहाँ लोग धूम्रपान कर सकते हैं तो कभी-कभार कोई स्मोकर किसी नान स्मोकर पर उसकी तरफ मुँह करके सिगरेट का कश लेकर धुआँ छोड़ता है तो नाक की हालत इतनी खराब हो जाती है कि बताना मुश्किल है...और उसके धुयें से सारा चेहरा जैसे नहा सा जाता है.

गर्मी की हाय-तोबा

सुनती हूँ कि आप लोग वहाँ भारत की भभकती गर्मी में बिलबिला रहे हैं. उससे कुछ राहत / निजात पाने के लिये यही उपाय सूझ रहा है कि आप सब ठंडा जल, शरबत, लस्सी, ठंडाई व मौसम्बी के जूस को पीजिये. सलाद और फल आदि का सेवन कीजिये. और हाँ, आजकल तो आमों का सीजन है वहाँ तो तमाम किस्म के बढ़िया आम भी तो आ रहे होंगे इन दिनों. तो उन्हें व अन्य फलों को जैसे खरबूजा, तरबूज, ककड़ी, अंगूर, जामुन, और खीरा भी शौक से खाइये. और आमला, सेव व बेल का मुरब्बा भी तो ठंडक पहुंचाता है तो उसे खाकर भी तरोताजा रहिये. रात में मच्छरों से अपनी सुरक्षा के लिये मच्छरदानी लगाना ना भूलें क्योंकि पंखे की हवा में भी ये दुष्ट अपनी दुष्टता से बाज नहीं आते.


एक सीक्रेट की बात भी...वो ये कि जो लोग आफिस में काम करते हैं वो रोज मुफ्त की हवा का लुत्फ़ उठायें...गरमी में ए सी की शीतलता से सुकून मिलने के साथ-साथ आपके पैसे की भी बचत होगी. ''एक पत्थर से दो चिड़ियों का शिकार'', है न ? या फिर आप लोग घर में हैं तो बिजली के पंखे व कूलर की ठंडक में पड़े रहिये. यदि इत्तफाक या आपकी बदकिस्मती से बिजली जाती है तो हाथ से झलने वाले पंखे सलामत रखिये..वो इस इमरजेंसी में बहुत काम आते हैं.


और यदि आप गाँव में हैं तो दरवाजा खुला रखिये और घर के अंदर हवा आने दीजिये. बरामदे में चारपाई पर आराम फरमाते हुये नैचुरल हवा का आनंद लीजिये. और अगर आपके यहाँ खुशकिस्मती से कोई पेड़ है नीम, आम, आमला, अमरुद, इमलिया, पीपल या बरगद...कुछ भी..तो उसके नीचे खरखरी खटिया पर विराजमान होकर सर्र-सर्र चलती हवा में आराम करिये...विश्वास कीजिये जो सुख इस पेड़ के नीचे आपको मिलेगा सोने में वो अतुलनीय है..उसका कोई मुकाबला नहीं पंखे की हवा से. और अगर वहाँ पर कोई कुआँ भी है तब तो सोने में सुहागा ! इसके मिनरल वाटर को पीकर मजे लीजिये और बिना बिजली के बिल की चिंता किये और उसके आने-जाने के नखरों को बिना सहे हुये सुबह, दोपहर शाम जब जी चाहे वाल्टी भर पानी शरीर पर उलीच कर नहाइये. इस स्वर्गीय सुख का आनंद लीजिये. रात में आंगन में खटिया पर बस एक दरी बिछाकर सोकर देखिये. पलकों को झपकाते हुये झींगुरों की आवाज़ व किसी आते-जाते मेढक की टर्र-टर्र के संगीत को सुनते हुये स्वप्नलोक की तरफ प्रस्थान करिये. और इस तरह गर्मी के सीजन के सुखों में खोकर अपने भाग्य को सराहिये. शुभ रात्रि !


* खरखरी=खुरदुरी, उलीच=उंडेलना

डायबिटीज और मरीज

डायबिटीज एक बहुत ही गंभीर बीमारी है जिसे एक बार हो जाने से इंसान को जिंदगी भर भुगतना पड़ता है. जब किसी को जांच करवाने पर पहली बार पता लगता है तो उस इंसान के व उसके परिवार के कदमों के नीचे से जैसे जमीन निकल जाती है. अब एक रिसर्च के मुताबिक सबके दिलों को हिला देने वाली खबर है कि हर तीन मिनट में एक इंसान डायबिटीज का शिकार होते हुये पाया जा रहा है. यहाँ इंग्लैंड में 3% लोग डायबेटिक हैं...और उनका नंबर बराबर बढ़ता ही जा रहा है. जिनमे अब युवा लोगों की संख्या भी बढ़ती जा रही है. और 2025 तक पूरे विश्व में डायबेटिक लोगों की संख्या दुगनी होने की सम्भावना की जा रही है.


डायबिटीज क्या है ?


डायबिटीज के लक्षण होते हैं हाई ब्लड सुगर लेवल या फिर लो ब्लड सुगर लेवल. और अगर डायबेटिक लोग लापरवाही बरतते हैं यानि अपने खान-पान में संतुलन नहीं रखते हैं तो इस असंतुलित ब्लड सुगर लेवल से उन्हें आँखों, किडनी, दिल, टांगों, पैरों और रक्तसंचार में बहुत समस्यायें पैदा हो सकती है.


शरीर का अग्न्याशय (Pancreas) अंतःस्राव (Harmone) को जिसे हम इंसुलिन कहते हैं उसे पैदा करता है. और इस इंसुलिन की सहायता से ग्लूकोस हमारे रक्तप्रवाह में पहुँचता है जिससे शरीर को ऊर्जा ( Energy) मिलती है. इंसुलिन की कमी व इसके ना होने से ग्लूकोस रक्तचाप में न पहुँचकर शरीर में इकठ्ठा हो जाता है और यूरिन में निकल जाता है. डायबिटीज का संबंध मोटापा व जननिक (Genetic) से भी है. या जो लोग मीठी चीज़ें अत्यधिक खाते हैं या शराब आदि बहुत पीते हैं उन्हें भी डायबिटीज हो जाने की अधिक सम्भावना रहती है. डाक्टर से इस बीमारी की पुष्टि होने के पहले इस बीमारी के आसार ये होते हैं:


1.प्यास का बहुत लगना.


2.अत्यधिक थकान.


3.दृष्टि में धुंधलापन.


4.बार-बार पेशाब जाना.


5.एकदम से तमाम वजन कम हो जाना.


6.घाव व जख्मों का जल्दी न भरना आदि.


जैसा कि अब अधिकाँश लोग जानते हैं डायबिटीज दो तरह की होती है:


A. टाइप 1 डायबिटीज: ये या तो जननिक (Genetic) होती है या अग्नाशय में शरीर के इम्यून सिस्टम या कहिये विषाणु (some Virus) से इंसुलिन पैदा करने वाले कोष की क्षति से इंसुलिन बिलकुल पैदा नहीं हो पाता. और इन मरीजों को हमेशा इंसुलिन के इंजेक्शन लगाने की जरूरत होती है. इसका अब तक और कोई इलाज नहीं है. कितनी बार, कब और शरीर के किस हिस्से में हर दिन इंजेक्शन लेना है ये डाक्टर ही बताता है.


B. टाइप 2 डायबिटीज: डायबेटिक लोगों में से 90% डायबेटिक टाइप 2 के होते हैं जिनके शरीर में बहुत कम इंसुलिन बनती है या फिर शरीर उसका इस्तेमाल ढंग से नहीं कर पाता है.


डाक्टर और नर्स जैसे अनुभवी लोगों का सहारा होते हुये भी इंसान को हर दिन खुद ही अपनी बीमारी का सामना करना पड़ता है. इसलिये उसके बारे में क्या करना है उसे खुद समझदारी से काम लेना चाहिये. डायबिटीज का प्रबंधन यानि अनुशासन (Management) स्वयं करना सीखना चाहिये. सेहत के लिये व्यायाम करना, टहलना, तैरना अच्छा है. अपना वजन कम करना चाहिये व और कामों में भी सक्रिय रहना चाहिये. डायबेटिक के लिये मीठी व तली चीजों को खाने की बिलकुल मनाही नहीं होती है. बल्कि उन्हें बहुत कम खायें और भी खाने की अन्य चीजों में संतुलन रखें. घी का इस्तेमाल न करके ओलिव आयल या रिफाइंड आयल का उपयोग करें लेकिन बहुत कम. खाना सही समय पर खायें व ताजे फल और सब्जियों का अधिक प्रयोग करें.


नियमित रूप से डाक्टर को दिखाना, ब्लड सुगर लेवल, कोलेस्ट्रल लेवल, और आँखों की जाँच करवाना बहुत ही जरूरी होता है ताकि कोई समस्या बढ़ने के पहले उसका सही उपचार किया जा सके.

जल है जीवन-धन

जल जीवन का आदि और अंत है - इंसान के जीवन का मूलतत्व है. और केवल इंसान ही नहीं...सारी सृष्टि ही इस पर निर्भर है. पेड़-पौधे, हर जीव-जंतु व पशु-पक्षियों के प्राणों का ये आधार है. केवल भारत के क्षेत्रों में ही नहीं बल्कि सारी दुनिया में अब इसका अकाल पड़ा है यानि कि इसकी कमी हो रही है; और कितनी ही जगहों में पेय जल दूषित पाया जा रहा है. लेकिन जहाँ इसकी कुछ अधिकायत है तो वहाँ किफ़ायत नहीं. कुछ लोग इसे बेफिजूल खर्च करते हैं और बिना किसी पाबन्दी के नल आदि को कई बार बहने देते हैं.


ये हँसती-मुस्कुराती हुई प्रकृति अब धीरे-धीरे उदास सी दिखने लगी है. इतराकर शोर मचाकर बहने वाली नदियों की वेगवती धारायें अब कमजोर पड़ने लगी है. लबालब भरे हुये हिलोरें लेते हुये पोखर व तालाब अब सूखे पाये जा रहे हैं. लहलहाते हुये जंगल व उपवनों में अब वह पहले वाली हरियाली और घनेपन का अहसास नहीं होता. पेड़-पौधे मुरझाकर मर रहे हैं. पशु-पक्षियों की नस्लें धरती से मिटने लगी हैं इसमें जल की कमी का हाथ है और प्रकृति का बदलता रूप जिसकी गोद में ये सब चहचहाते हैं और खेलते हैं वो अपनी सुंदरता खोने लगी है. इस तरह से धरती का सीना एक दिन बिलकुल सूख जायेगा और तब इस सृष्टि में कोई जीवन नहीं बचेगा. और वह, जिसके सहारे हम बैठे हुये हैं..यानि इस सृष्टि का चित्रकार, चुपचाप कहीं मजबूर सा बैठा हुआ है कुछ भी करने में असमर्थ हो रहा है तो हमें ही कुछ करना चाहिये...सोचना चाहिये.


और तब बस यही उपाय समझ में आता है कि जल की त्राहि-त्राहि करते हुये संसार को बचाने के लिये हमें केवल अपने ही लिये नहीं बल्कि अपने समस्त देश व सारी दुनिया की भलाई के बारे में सोचना चाहिये. और इस जीवन-धन जल को बहुत किफ़ायत से खर्च करना चाहिये. ये मेरा सबसे विनम्र निवेदन है. धन्यबाद.


Saturday, 7 May 2011

एकमत होना एक समस्या

अगर आप सब इस बात से सहमत हैं कि जमाना बदल गया है तो इसका मतलब है कि लोगों का हर बात की अहमियत समझने का नजरिया भी बदल गया है. धर्म, रीति रिवाज, खान-पान और रहन-सहन के बारे में आजकल हर जगह लोग स्वतंत्रता चाहते हैं. कहीं पति नास्तिक है तो पत्नी नहीं..तो पत्नी मन में ही प्रार्थना करती रहती है परिवार के लिये. और कभी-कभी पति के बिचार बदल जाते हैं तो वो आस्तिक बन जाते हैं. वरना शादी के बाद भी अधार्मिकता में अक्खड़ ही रहते हैं.

किसी ने हाल में ही मुझसे कहा है कि मैं कुछ ऐसा लिखूँ कि भारत के समाज में जो समस्यायें हैं और उनसे जो बिखराव है लोगों में वो दूर हो जाये और उनमें एकता आ जाये. वो लोग राजनीति के बखेड़ों में पड़कर उनकी ही बातें करते रहते हैं किन्तु अपने संप्रदाय से जुड़ी धार्मिक बातों में रूचि नहीं रखते. तो मैं चकित रह गयी कि इतनी दूर रहते हुये मैं वहाँ के लोगों को क्या समझा सकती हूँ. तो उन कुछ मुद्दों में से एक ये था कि मैं भारत में किसी धार्मिक समारोह में शामिल होने के लिये उनके संप्रदाय के लोगों को वहाँ जाने को प्रेरित करूँ जहाँ तमाम लोग उसे मनाने जा रहे हैं...यानि वो सब उस धार्मिक समारोह में एक होकर भाग लें. क्योंकि लोग सहमत होकर भी वहाँ जाकर भाग नहीं लेना चाहते. तो ये सुनकर मुझे बहुत ताज्जुब हुआ. सोचने पे मजबूर हो गयी कि इंसान अपनों पर तो आजकल जोर नहीं रख पाता, उन्हें समझाने में दिक्कत होती है तो दूर रहने वालों को कोई कैसे समझा सकता है.


परिवार में आजकल बच्चों या पति पर भी जोर नहीं होता कि सब मिलकर किसी धार्मिक समारोह में भाग लेने कहीं चलें. किसमे कितनी इच्छा है और कितना उत्साह है इन बातों पर ध्यान रखना चाहिये और स्वेच्छा से काम होने चाहिये दबाब में नहीं. और फिर ये काम तो अपने देश में ही विभिन्न समुदाय के लोग खुद ही आपस की समझदारी से मतभेद दूर करके भी कर सकते हैं. जिन लोगों को मैं नहीं जानती और ना ही वो मुझे जानते हैं तो बिना उनके बिचारों को जाने हुये अपनी तानाशाही लादने का मुझे क्या हक है. और फिर दूसरी बात ये कि कोई मेरी बात क्यों सुनने व समझने लगा. धार्मिक व रीति रिवाज़ की बातों को कितना कोई निभाता है या नहीं अपने कुटुंब परिवार में ये लोगों के अपने बिचारों पर निर्भर करता है. किसी इंसान पर एक हद तक ही दबाब डाला जा सकता है वरना आपसी अनबन होने का डर रहता है. पहले बड़े लोगों की बातों को मानने को लोग तत्पर रहते थे पर अब कोई उनकी कही बातों को अहमियत नहीं देता. समय जो बदल गया है.


मैं यहाँ इतनी दूर हूँ. ये बातें मैं कैसे भारत में रहने वाले उन सब लोगों को समझा सकती हूँ...जब कि वहीं रहने वाले किसी अपने की कोई नहीं सुनता. वहाँ के समाज में मैं किसी को जानती तक नहीं व्यक्तिगत रूप से. ये आपस की बाते हैं धार्मिकता से सम्बंधित जिस पर लोगों को करने या न करने पर जोर नहीं डाला जा सकता. लोग आपस में ही सुलझायें तो बेहतर होगा. सम्लित परिवार में भी आजकल कहीं हिंदू बहू है तो कहीं क्रिश्चियन. माता-पिता की सेवा करवाने व उनके बिचारों को अपनी पत्नी पर लादने के लिये भी लोग इन दिनों शादी नहीं करते. आजकल हसबैंड माइंड नहीं करते कि पत्नी उन्ही के धर्म की हो. वो जो चाहती है करती है. शादी भी आपस का समझौता है. आज की पीढ़ी के लोग घर वालों, रिश्तेदारों या समस्त समाज को खुश करने की खातिर अपनी शादी नहीं करते. और लड़का-लड़की आजकल शादी के बाद धार्मिक व रीति रिवाज़ से सम्बंधित मसलों को खुद ही सुलझा लेते हैं. और किसी का भी हस्तक्षेप अपने जीवन के किसी निर्णय पर नहीं चाहते. आपस में ही तय कर लेते हैं कि वह किस बात की एक दूसरे को छूट दे रहे हैं.

जब किसी अवसर पर मूर्ति दर्शन कर पाओ मंदिर जाकर तब बड़ा अच्छा लगता है. लेकिन विदेश में रहते हुये ये सब सबके लिये संभव नहीं है. किन्तु भारत में तो हर जगह मंदिर हैं फिर भी कितने लोग रोज जाते हैं वहाँ ? और कुछ लोग तो घर में ही मूर्ति-स्थापना कर लेते हैं. लेकिन फिर भी सब सदस्य पूजा नहीं कर पाते मिलकर हर दिन...तो भारत में भी घर-घर की कहानी फरक है. धर्म का मसला बहुत व्यक्तिगत है...किसके दिल में क्या है...क्या बिचार हैं किस बारे में इस पर जोर नहीं. तमाम युवा पीढ़ी के लोग तो मन में भी धार्मिक आस्था नहीं रखते. सबसे बड़ा धर्म तो मानवता है. और सब अपना अच्छा बुरा समझते हैं. और मुझसे पहले न जाने कितनों ने इस तरह की समस्यायों पर लिखा होगा. कितने भारतीय लेखकों ने अपने बिचार लिखे होंगे. लेकिन फिर भी किसी का लिखा हुआ पढ़कर लोग उसे भूल जाते हैं या फिर कितने लोग हर लेख पढ़ना चाहते हैं और उन बातों पर अमल करना चाहते हैं. लेखक मात्र एक हँसी का पात्र बनकर रह जाता है जिसपर छींटाकशी हो सकती है यह कहकर कि :

''पर उपदेश कुशल बहुतेरे'' माइंड योर बिजिनेस वाली बात होगी...और कुछ नहीं.

जो लोग मुझे मान देते हैं, ये कहकर कि मेरे कुछ लिखने से शायद लोगों में बिखराव कम हो जाये या कुछ मुद्दों पर वो लोग संगठित हो जायें, उस मान की मैं कदर करती हूँ और खुशी होती है. लेकिन मैं कोई मसीहा तो नहीं. क्या कहकर या करके किसी को समझाया जा सकता है. दुनिया भर के लोगों ने जो समझाने की कोशिश की होगी लेख लिखकर या किसी समस्या पर चर्चा करके अन्य लोगों को फिर भी असर नहीं हुआ. तो फिर उन्हीं बातों पर पता नहीं कहाँ-कहाँ दुनिया भर में फैले भारतीय लोगों को संगठित करके समाज की खुशी के लिये समझाना या ऐसे बिचारों को थोपना, जिनका मैं पास रहने वालों पर भी प्रभाव नहीं डाल सकी, मेरे लिये एक सपना है. अब क्या मैं कोई अनशन करूँ अन्ना हजारे की तरह भारत आकर ? और वो तो सरकार से एक शिकायत थी..राष्ट्र के लिये था और लोकपाल बिल का खाका खींचा गया फिर भी अब तक खटाई में पड़ा है. लेकिन ये कदम तो सामाजिक मुद्दों के लिये उठाने को पूछा जा रहा है. जहाँ अनशन करके लोगों की बिचारधारा बदलने की मांग रखी भी जाये तब भी कौन-कौन परवाह करेगा उस माँग की.


हर कोई अपने आप ही जानता है कि परिवार व समुदाय में क्यों बिखराव है और उसे कैसे दूर किया जा सकता है. मैं किसी की आलोचना नहीं कर रही..सिर्फ आज के युग की वास्तविकता से परिचित करा रही हूँ. और इस तरह के तमाम लोगों से मिलकर ही हमारा आज का समाज बनता है. और उस समाज में जो लोग रह रहे हैं वो कितने नजदीक हैं, क्या बिचार हैं उनके आदि बातों पर विमर्श करके किसी भी सामाजिक समस्या को स्वयं सुलझायें एक दूसरे की भावनाओं को समझते व कदर करते हुये तो बेहतर होगा. राष्ट्र व समाज से जुडी समस्यायें बड़ी विकट होती हैं और उन्हें उसी देश में रहने वाले लोग सुलझा सकते हैं. या वहाँ के तमाम प्रभावशाली लोग अच्छी तरह से जानते हैं कि कहाँ क्या हो रहा है और उसकी नब्ज़ कहाँ पर पकड़नी चाहिये.


Sunday, 1 May 2011

नयी पीढ़ी, नया परिवेश

नयी कौम है नया जमाना, और सबकी है एक कहानी

बच्चों की सोच बदल गयी, सब करते अपनी मनमानी.


कितने ही लोगों से सुनने में आता है कि आजकल के बच्चे कुछ और ही तरीके से सोचने लगे हैं. उन्हें ये ख्याल अच्छा नहीं लगता कि माता-पिता ने उन्हें अपने बुढ़ापे का सहारा बनने के वास्ते अपने स्वार्थ के लिये पैदा किया है. भारत व विदेशों के बच्चों की सोच अब करीब-करीब एक सी हुई जा रही है. अधिक बंधन लगाने से माता-पिता को डर रहता है कि कहीं उन्हें खो न दें यानि कहीं वो अलग ना रहने लगें या बोलना ही छोड़ दें उनसे. इसलिये बच्चों से उन्हें जरा दब कर रहना पड़ता है. वो जमाने गये जब बड़े लोग उन्हें उपदेश दे सकते थे और वो समझदारी से सुनते थे और बच्चे फिर उन बातों पर अमल करते थे. अब तो बड़े भी उनसे कुछ कहते डरते हैं. पहले बड़े सलाह देते थे और अब बच्चे सलाह लेते नहीं बल्कि देने लगे हैं. पहले के बच्चे पूछते थे कि 'ये काम करना ठीक रहेगा या नहीं' , या 'क्या हम वहाँ चले जायें ठीक होगा या नहीं ?' लेकिन नयी पीढ़ी के कहते हैं कि 'हम ये करने जा रहे हैं ' या 'हम वहाँ जा रहे हैं '( कभी-कभी तो वो भी कहना जरूरी नहीं समझते ) और ये ऐलान वो अचानक कभी भी कर सकते हैं. अपने को दुनियादारी की हर बात में बहुत होशियार समझते हैं. और कभी उनसे घर में हेल्प लेने का प्लान बनाओ तो पता चलता है कि वो पहले से ही अपने पार्टनर या फ्रेंड्स के साथ कोई और प्लान बना चुके हैं. अपने दोस्तों का साथ देने को घर में हेल्प देने का प्लान कैंसिल कर देते हैं. दोस्तों को माता-पिता से अधिक अहमियत देने लगे हैं. क्योंकि उन्हें घर में किसी की परवाह नहीं. उनका मन क्या करता है करने को बस इस बात की परवाह करते हैं. दबाब डालने या समझाने पर वो बोर हो जाते हैं या बीच में ही नाराज़ होकर चले जाते हैं पूरी बात बिना सुने.


और बेटे अगर शादी शुदा हैं तो उनकी बीबियों को घर की सफाई सुथराई करना नहीं भाता है. तो या तो बेटे करते हैं या फिर माता-पिता. आजकल की सासें तो वैसे भी बहू के आने पर उनसे सब काम नहीं लेतीं. वो इतनी एक्टिव रहना चाहती हैं कि तमाम काम खुद ही कर लेती हैं. लेकिन जब बहू अपनी जिम्मेदारी किसी भी काम की न समझे तब बहुत मुश्किल हो जाती है. बहू से सास-ससुर डर के मारे केवल इशारे से ही कहते हैं किसी काम के लिये कभी तो वोह समझ के भी समझना नहीं चाहतीं. कि देखो तुम कुछ भी कहो हम पर तुम जोर नहीं रख सकते हम अपनी मनमानी करेंगें. और अगर किसी का अकेला बेटा है और साथ रहता है माँ-बाप के साथ शादी के बाद भी तो भी बहू को अखरता है. उसे तो सास के रूप में एक नौकरानी मिल जाती है लेकिन सास को और अकेलापन...क्योंकि अब बेटा भी उतना नहीं बोलता माँ से. और माँ अपना दर्द सीने में छिपाये रहती है कि कुछ कहने से कहीं बेटा को बुरा न लग जाये और अलग ना रहने लगे. काम के बारे में नयी बहुयें सोचती हैं कि वह बाहर काम करती हैं. उन्हें नहीं पता कि एक दिन सास भी काम पर जाती थी और उसके बाद घर की पूरी ड्यूटी भी करती थी सातों दिन. लेकिन नयी पीढ़ी की बहुयें सुपरमार्केट से खाने की चीजें फ्रिज व फ्रीजर में भर लेती हैं, सफाई के बारे में बहुत आलसी...उन कामों को करने की वजाय सहेली से मिलने खिसक लेती हैं. लेकिन सास अपने जमाने में घर का काम पूरा निपटा के तब मिलती थी सहेलियों से. बहुत अंतर है, है न ?


और आजकल वाली तो बाहर का खाना खाने को हर समय तैयार रहती हैं. घर में खाना सास तैयार किये बैठी है और वो लोग ऐलान कर देते हैं बाहर का खाना खाने को. काम करके सास चाहें कितना ध्यान रखे बहू का और लाड़-प्यार करे उसे अपनी बेटी मानकर पर उससे एक बेटी की तरह की हेल्प नहीं मिलती. वीकेंड का इंतज़ार करते हैं तो बहू बिना बताये हर वीकेंड का प्लान बना चुकी होती है. सारा दिन के लिये आउट. बेटे अपनी पत्नियों की हर बात से सहमत रहते हैं. साल के किन्ही खास अवसरों के अलावा माँ-बाप के संग कहीं जाना भी नहीं अब पसंद करते वो लोग. तो सिचुएशन ये होती है उन माँ-बाप के लिये कि अपने पास कभी-कभार बिठाकर उनसे कोई बात तो करना दूर उनकी तो शकल देखना भी अधिक नसीब नहीं हो पाता वीकेंड पर भी. और बहुयें जब घर पर रहती हैं तो अपने कमरे में बंद रहकर सारा दिन टीवी या किसी और मनोरंजन में व्यस्त रहती हैं. सास का डिप्रेशन और बढ़ जाता है. और बेटे महसूस ही नहीं करते कि उनकी पत्नी कुछ देर उनकी माँ के पास भी बैठे. इस तरह की समस्यायें कितने ही माता-पिता व सास-ससुर के लिये जटिल होती जा रही हैं. फिर भी माता-पिता अपने बहू बेटे को दिलो-जान से चाहते हैं..और हर समय उनका भला मनाते हैं.