Sunday, 1 May 2011

नयी पीढ़ी, नया परिवेश

नयी कौम है नया जमाना, और सबकी है एक कहानी

बच्चों की सोच बदल गयी, सब करते अपनी मनमानी.


कितने ही लोगों से सुनने में आता है कि आजकल के बच्चे कुछ और ही तरीके से सोचने लगे हैं. उन्हें ये ख्याल अच्छा नहीं लगता कि माता-पिता ने उन्हें अपने बुढ़ापे का सहारा बनने के वास्ते अपने स्वार्थ के लिये पैदा किया है. भारत व विदेशों के बच्चों की सोच अब करीब-करीब एक सी हुई जा रही है. अधिक बंधन लगाने से माता-पिता को डर रहता है कि कहीं उन्हें खो न दें यानि कहीं वो अलग ना रहने लगें या बोलना ही छोड़ दें उनसे. इसलिये बच्चों से उन्हें जरा दब कर रहना पड़ता है. वो जमाने गये जब बड़े लोग उन्हें उपदेश दे सकते थे और वो समझदारी से सुनते थे और बच्चे फिर उन बातों पर अमल करते थे. अब तो बड़े भी उनसे कुछ कहते डरते हैं. पहले बड़े सलाह देते थे और अब बच्चे सलाह लेते नहीं बल्कि देने लगे हैं. पहले के बच्चे पूछते थे कि 'ये काम करना ठीक रहेगा या नहीं' , या 'क्या हम वहाँ चले जायें ठीक होगा या नहीं ?' लेकिन नयी पीढ़ी के कहते हैं कि 'हम ये करने जा रहे हैं ' या 'हम वहाँ जा रहे हैं '( कभी-कभी तो वो भी कहना जरूरी नहीं समझते ) और ये ऐलान वो अचानक कभी भी कर सकते हैं. अपने को दुनियादारी की हर बात में बहुत होशियार समझते हैं. और कभी उनसे घर में हेल्प लेने का प्लान बनाओ तो पता चलता है कि वो पहले से ही अपने पार्टनर या फ्रेंड्स के साथ कोई और प्लान बना चुके हैं. अपने दोस्तों का साथ देने को घर में हेल्प देने का प्लान कैंसिल कर देते हैं. दोस्तों को माता-पिता से अधिक अहमियत देने लगे हैं. क्योंकि उन्हें घर में किसी की परवाह नहीं. उनका मन क्या करता है करने को बस इस बात की परवाह करते हैं. दबाब डालने या समझाने पर वो बोर हो जाते हैं या बीच में ही नाराज़ होकर चले जाते हैं पूरी बात बिना सुने.


और बेटे अगर शादी शुदा हैं तो उनकी बीबियों को घर की सफाई सुथराई करना नहीं भाता है. तो या तो बेटे करते हैं या फिर माता-पिता. आजकल की सासें तो वैसे भी बहू के आने पर उनसे सब काम नहीं लेतीं. वो इतनी एक्टिव रहना चाहती हैं कि तमाम काम खुद ही कर लेती हैं. लेकिन जब बहू अपनी जिम्मेदारी किसी भी काम की न समझे तब बहुत मुश्किल हो जाती है. बहू से सास-ससुर डर के मारे केवल इशारे से ही कहते हैं किसी काम के लिये कभी तो वोह समझ के भी समझना नहीं चाहतीं. कि देखो तुम कुछ भी कहो हम पर तुम जोर नहीं रख सकते हम अपनी मनमानी करेंगें. और अगर किसी का अकेला बेटा है और साथ रहता है माँ-बाप के साथ शादी के बाद भी तो भी बहू को अखरता है. उसे तो सास के रूप में एक नौकरानी मिल जाती है लेकिन सास को और अकेलापन...क्योंकि अब बेटा भी उतना नहीं बोलता माँ से. और माँ अपना दर्द सीने में छिपाये रहती है कि कुछ कहने से कहीं बेटा को बुरा न लग जाये और अलग ना रहने लगे. काम के बारे में नयी बहुयें सोचती हैं कि वह बाहर काम करती हैं. उन्हें नहीं पता कि एक दिन सास भी काम पर जाती थी और उसके बाद घर की पूरी ड्यूटी भी करती थी सातों दिन. लेकिन नयी पीढ़ी की बहुयें सुपरमार्केट से खाने की चीजें फ्रिज व फ्रीजर में भर लेती हैं, सफाई के बारे में बहुत आलसी...उन कामों को करने की वजाय सहेली से मिलने खिसक लेती हैं. लेकिन सास अपने जमाने में घर का काम पूरा निपटा के तब मिलती थी सहेलियों से. बहुत अंतर है, है न ?


और आजकल वाली तो बाहर का खाना खाने को हर समय तैयार रहती हैं. घर में खाना सास तैयार किये बैठी है और वो लोग ऐलान कर देते हैं बाहर का खाना खाने को. काम करके सास चाहें कितना ध्यान रखे बहू का और लाड़-प्यार करे उसे अपनी बेटी मानकर पर उससे एक बेटी की तरह की हेल्प नहीं मिलती. वीकेंड का इंतज़ार करते हैं तो बहू बिना बताये हर वीकेंड का प्लान बना चुकी होती है. सारा दिन के लिये आउट. बेटे अपनी पत्नियों की हर बात से सहमत रहते हैं. साल के किन्ही खास अवसरों के अलावा माँ-बाप के संग कहीं जाना भी नहीं अब पसंद करते वो लोग. तो सिचुएशन ये होती है उन माँ-बाप के लिये कि अपने पास कभी-कभार बिठाकर उनसे कोई बात तो करना दूर उनकी तो शकल देखना भी अधिक नसीब नहीं हो पाता वीकेंड पर भी. और बहुयें जब घर पर रहती हैं तो अपने कमरे में बंद रहकर सारा दिन टीवी या किसी और मनोरंजन में व्यस्त रहती हैं. सास का डिप्रेशन और बढ़ जाता है. और बेटे महसूस ही नहीं करते कि उनकी पत्नी कुछ देर उनकी माँ के पास भी बैठे. इस तरह की समस्यायें कितने ही माता-पिता व सास-ससुर के लिये जटिल होती जा रही हैं. फिर भी माता-पिता अपने बहू बेटे को दिलो-जान से चाहते हैं..और हर समय उनका भला मनाते हैं.

विलियम व कैथरीन की शादी - 29.04.2011

देखते ही देखते समय बीत गया और प्रिंस चार्ल्स के दोनों बेटे विलियम व हैरी बड़े हो गये. और आज है 28 साल के बड़े बेटे प्रिंस विलियम की शादी का दिन. पूरे जोर-शोर से लन्दन में कल से उत्सव मनाया जा रहा था. वैसे भी लोगों को यहाँ किसी बात का बहाना चाहिये उत्सव के नाम पर...और फिर ये तो एक प्रिंस की शादी है. तो आप समझ सकते हैं कि यहाँ लंदन में इस पर कितनी चर्चा और धूम-धड़क्का हो रहा होगा. सुबह से ही आसमान पर हलके बादल छाये हुये थे. सबको डर था कि कहीं बारिश ना हो और दूर-दूर से आये हुये लोगों को, जो शादी का जुलूस देखने के लिये हर सड़क के फुटपाथों पर जमा हो रहे थे कल रात से ही, उन्हें निराश न होना पड़े. उस भीड़ में तमाम लोग विदेशों से भी आये हुये थे. जबकि ये समारोह वह अपने देश में टीवी पर भी घर बैठे देख सकते थे. लोगों की लंबी कतारें लगी थीं सड़क के किनारों पर, पुलिस की कड़ी निगरानी में. पर हम यहाँ घर पर ही इत्मीनान से टीवी के आगे जमे बैठे थे...खाने-पीने का इंतजाम करके. चाय आदि पीते हुये आराम से ये सब तमाशा देखना शुरू किया. बेकार में भीड़ में जाकर हाथ-पैर कुचलवा के क्या फ़ायदा.

खैर, आगे बढ़ते हैं...Westminster Abbey जहाँ हर शाही शादी होती है उसके अंदर लाल रंग की कालीन बिछी हुई थी और बाहर तमाम प्रसिद्ध हस्तियाँ यानि बड़े नामी लोग दिख रहे थे जो अंदर जाकर अपने लिये नियुक्त सीट पर बैठने की जल्दी में थे. उनमे मिस्टर बीन, एल्टन जॉन, बेकहैम और पोश, जॉन मेजर, केनेथ विलियम और भी न जाने कितने पुराने चेहरे दिख रहे थे. दूर खड़ी हुई भीड़ में से निरंतर शोर उठ रहा था. उनमें तमाम लोग ब्रिटिश झंडे की डिजाइन को चेहरे पर पेंट करवाये हुये थे, वस्त्र व हैट के रूप में भी पहने हुये थे, कुछ लोग हाथ में झंडों को पकड़े हुये खुशी से चीख रहे थे. भीड़ में छोटे-छोटे बच्चे तक बड़े धैर्य से प्रतीक्षा कर रहे थे. सड़कों के किनारे कतार में ऊँचे-ऊँचे शाही झंडे फहरा रहे थे. और लंदन के प्रसिद्ध हाइड पार्क में दो बहुत बिशाल स्क्रीन लगायी गयी थीं..जिनपर बराबर सब कुछ लाइव शो आ रहा था. ऊपर से हेलीकाप्टर नीचे के सीन का कवरेज कर रहे थे और नीचे तमाम और मीडिया के लोग. सड़कों पर कारें बहुत ही शालीनता से मेहमानों को लेकर आ रही थीं.

थोड़ी देर में विलियम भी अपने भाई हैरी के साथ एक शाही कार में आ गये. और Abbey के अंदर जाते हुये सबसे हँसते बोलते एक प्राइवेट एरिया में चले गये. रुक-रूककर चर्च की घंटियाँ बज रही थीं. यहाँ की रानी व दूर और पास के सभी रिश्तेदार भी आ गये और उनके बाद बिदेशों के निमंत्रित शाही मेहमान भी. कैथरीन की बहिन फिलिप्पा जो ब्राइडमेड है साथ में चार और छोटी-छोटी ब्राइडमेड के संग आती है और अब कैथरीन भी लिमजीन में अपने पिता के संग आ गयी उनका हाथ पकड़े हुये, जैसा कि रिवाज़ है. वह सर पर रानी का दिया हुआ छोटा सा मुकुट (किरीट) पहने थी जो 1936 में बना था और इसी अवसर के लिये शाही खानदान की बहुओं को पहनने को दिया जाता है. Abbey के अंदर मयूजिक आरंभ हो गया. प्रिंस विलियम भी आकर कैथरीन के साथ दाहिने तरफ खड़े हो गये. प्रीस्ट ने वचन पढ़े और उन दोनों ने एक दूसरे का साथ जीवन के हर अच्छे-बुरे समय में निभाने की हामी भरी. विलियम ने कैथरीन को एक अँगूठी पहनाई. और दोनों ने जाकर मैरिज रजिस्टर में हस्ताक्षर किये. फिर एक तरफ जाकर सीटों पर बैठ गये. कुछ देर ईश्वर की प्रार्थना की ध्वनि गूँजती रही. सबके ओंठ हिल रहे थे उच्चारण करते हुये. सब कुछ बहुत ही शानदार तरीके से संपन्न हुआ. अंदर बाहर सब प्रकार की व्यबस्था का बहुत ही भव्य प्रदर्शन था. काश ! आज प्रिंस विलियम की माँ प्रिंसेस डायना अपने बेटे की शादी देखने व उसे आशिर्वाद देने को यहाँ होती.

चर्च की घंटियाँ निरंतर बजे जा रही थीं. फिर कुछ देर बाद दोनों पति-पत्नी शाही घोड़ा-गाड़ी में बैठे और बकिंघम पैलेस को रवाना हुये. उनकी छोटी-छोटी हरकतें भी टीवी पर आ रही थीं. उनके चारों ओर घोड़ों पर सवार शाही गार्ड्स चल थे. शाही जोड़ा सड़कों पर खड़ी भीड़ को अपने हाथ हिलाके उनका धन्यबाद कर रहा था जो वहाँ घंटों से उनकी झलक देखने को बेचैन थी. हर तरफ खुशी की लहरें दौड़ रही थीं. आसमान शोर से जैसे गूँज रहा था. और वो दोनों मुस्कुराते हुये उनके बीच से निकल रहे थे हाथ हिलाते हुये. ये सब जैसे किसी पुरानी कहानी की तस्वीरों जैसा परीलोक की शादी का सीन लग रहा था. बकिंघम पैलेस पहुँच कर कुछ समय पश्चात वो दोनों महल की बाहरी बालकनी पर आये और यहाँ की रिवाज के मुताबिक विलियम व कैथरीन ने सारी पब्लिक के सामने चुम्बन लिया. दूर से दर्शकों में कोलाहल उठा और तमाम भीड़ ने उन दोनों को तमाम बधाइयाँ दीं.

मैं ये आलेख लिख रही हूँ और वहाँ इस समय बकिंघम पैलेस में शाही दावत दी जा रही होगी. सुना है कि रानी जी यानि क्वीन ने 300 लोगों को इनवाइट किया है किन्तु हमें पता है कि उनमें हमारा नाम नहीं है. फिर भी हमारी तरफ से प्रिंस विलियम व प्रिंसेस कैथरीन को उनकी शादी पर बधाई व तमाम शुभकामनायें !

फेसबुक के भूत

अब हम भी क्या क्या करें....


दिल की कुछ बातें कहनी ही पड़ती हैं

दोस्त हैं तो शेयर करनी ही पड़ती हैं

फेसबुक मुँह देखे की दुनिया है दोस्तों

गर शेयर ना करो तो बहुत अखरती हैं.


कल रात फेसबुक पर दो सहेलियाँ बातचीत कर रही थीं...नाम गुमनाम ही रहने दीजिये तो अच्छा रहेगा. लीजिये चुपचाप आप भी उनकी बातचीत का लुत्फ़ उठाइये:


सहेली १: मुझे फेसबुक के भूतों से बहुत डर लगता है.

सहेली २: क्या मतलब है तुहारा ?

सहेली १: पता है कुछ देर पहले क्या हुआ था ?

सहेली २: नहीं पता...बताओ क्या हुआ ?

सहेली १: एक मित्र की हरकतें कुछ दिनों से सही नहीं थीं...इनबाक्स में आकर अजीब से शब्द कहकर भाग जाते थे..और मैं हमेशा चुप रहती थी...और आज तो हद ही हो गयी.

सहेली २: क्या किया उसने ?

सहेली १: आज उसने भूत की तरह एक्टिंग करके मुझे डराया..और मैं डर गयी.

सहेली २: तो क्या कहा उसने ?

सहेली १: बोला...HOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOO

सहेली २: तुमने भी फिर कुछ कहा ?

सहेली १: हाँ, मैंने उससे कहा...SHOOOOOOOOOOOOOOOOOOO

सहेली २: उसके बाद ?

सहेली १: उसके बाद मैंने उसे असली भूत बना दिया.

सहेली २: वो कैसे ?

सहेली १: ब्लाक कर दिया.

रचनाओं से सम्बंधित एक दुख की सूचना

दोस्तों,

मुझे ये सब कहते हुये बड़ा अफ़सोस हो रहा है किन्तु फिर भी जानकारी देने को कहना / पूछना पड़ रहा है कि...

क्या कभी किसी ने आपकी लिखी रचनाओं को आपके न जाने हुये अपने नाम से पोस्ट किया है अपने नोट में ?...क्यों कि मेरे साथ ऐसा हुआ है. और किसी की इस हरकत के बारे में मुझे कल पता लगा. मैं उनका नाम लेकर सबको बताकर उन्हें लज्जित नहीं करना चाहती...किन्तु मुझे बहुत धक्का लगा था..और अब भी सदमे में हूँ. हुआ ये कि कल एक नयी फ्रेंड रिक्वेस्ट को मैंने जब स्वीकार किया तो उनके पन्ने पर जाकर पता लगा कि उन्होंने मेरी दो कवितायें अपने नाम से लगाई हुई थीं..लेकिन उनमें कहीं भी मेरा नाम मेंशन नहीं किया गया था.

पूछने पर पता लगा कि उन्होंने मेरे ब्लाग से कापी पेस्ट किया था...और ये जानकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता हुई कि उन्हें मेरा ब्लाग बहुत अच्छा लगा था. किन्तु उन्होंने रचनाओं में मेरा नाम न डालकर अपना नाम डाला हुआ था और लोगों से कमेन्ट भी ले रहे थे अपने नाम पर. फिर मेरे कहने व शिकायत करने पर उनमें मेरा नाम डाला. इस तरह पता नहीं पहले भी मेरी कितनी और रचनाओं के संग ऐसा किया होगा. तो समस्या यह है कि न जाने कितने और लोग भी इस तरह की गलत बात कर रहे होंगे. मैं किस-किसका पता लगाकर उन लोगों को बताऊँ कि इस तरह की बात करना अनुचित है. पढ़ने वाले गलतफहमी में आकर उन्हें उसी इंसान की रचित रचना समझ कर कमेन्ट दे रहे होंगे..फिर भी वो नहीं बताते कि वो पोएम उनकी नहीं किसी और की लिखी हैं. फेसबुक से शेयर करने में कम से कम मेरा नाम तो रचना के साथ आ सकता था.

बहुत दुख के साथ आपकी फेसबुक मित्र

- शन्नो अग्रवाल

तेरी याद अब भी आती है - भाग 2

प्रिय भारत,

लो आज मैं फिर आ गयी तुमसे बात करने को..अब तुम सोच रहे होगे कि मैंने तुमसे परसों बात करते हुये अंत में कल यानि उसके अगले दिन यानि जो कल गुजर गया...फिर बात करने का वादा किया था कि अपनी बातचीत जारी रखूँगी लेकिन वो वादा पूरा न कर सकी और इसका मुझे अहसास है..इसका बुरा ना मानना क्यों कि कुछ कारन हो गया था. शायद तुम्हें मेरी बातें बकबास लग रही हों...क्योंकि हमारी बातचीत इक तरफ़ा रहती है..मैं ही बोल सकती हूँ..तुम तो मौन हो. इसलिये मैं तुमसे खुद ही बातें करती रहती हूँ. तुम्हारी खासियत यही है कि तुम मेरी और सबकी बातें सुनकर हमेशा बस चुप ही रहते हो..इसलिये मुझे यदि दिल की बात कहना है तो कहती ही जाऊँगी. करने को तो वैसे बहुत सारी बाते हैं..लेकिन सब कुछ इकठ्ठा तो नहीं कह सकती ना ?

हाँ, तो मैं कह रही थी कि इंसान के सभी किये हुये वादे झूठे नहीं होते बल्कि किसी बात या मजबूरी से कभी मुस्तकिल नहीं हो पाते हैं. ये सब मैं झूठ नहीं बोल रही हूँ वर्ना आगे से मैं कोई वादा नहीं करूँगीं..हाँ..क्या समझे ? बात यूँ हुई कि कल कहीं से तुम्हारी ही शरण में रहने वाली गरीब महिलाओं के बारे में बहुत दुखद और दयनीय हाल पढ़ने का मौका लगा..तो उसके बाद दिल बहुत बेचैन हो गया और तुम्हे पत्र लिखने की वजाय उनके बारे में एक रचना लिखने लगी थी..फिर इतना थक गयी कि निद्रा देवी की गोद में सर रख के भयानक सपनों के लोक में पहुँच गयी. जहाँ इतनी भीड़ थी कि पूछो ना..लोग चारों तरफ तुम्हारे गाने गा रहे थे '' मेरा भारत महान..आई लव माई इंडिया..आई एम प्राउड टु बी एन इंडियन ..हमारे वतन जैसा कोई और वतन नहीं..भारत एक ऐसा देश है जहाँ सभी धर्म मिलकर रहते हैं..मेरे देश की धरती सोना है..भारत की जन्म भूमि हमारी जननी है जो स्वर्ग से महान है ''...आदि-आदि. और मेरा दिमाग बौखला रहा था सोचकर कि तमाम लोग तुम्हें महान कहने के वावजूद भी तुम्हारा अपमान करने से नहीं चूकते..जरा तुम ही सोचो कि ये सब कुछ कितना सच है या नहीं. और अगर सच है तो कितना ?

जहाँ मानवता की तारीफ होती है वहाँ पे न जाने कितनी गरीब औरतों व छोटे बच्चों को ऐसे काम करने पड़ते हैं कि दिल दहल जाये. जिंदगी की छोटी-छोटी खुशियों तक से महरूम रहते हैं वो लोग. अपने पेट की ज्वाला बुझाने और तन ढँकने को इस बेरहम दुनिया में हर काम करने को तैयार हो जाते हैं. कुछ काम ऐसे होते हैं जिन्हें करते हुये उनके हाथ तक गल जाते हैं...घंटों ही बहुत मुश्किल और खतरे वाले काम करने पर भी जरा से ही पैसे पाते हैं. जो लोग ऊँचे-ऊँचे घरों में रहकर तमाम सुख सुविधा का आनंद लेते हुये इस तरह के तुच्छ काम पैसे के लिये मजबूर लोगों से करवाते हैं और ढंग से पैसे भी नहीं देते बदले में तो क्या उनमें मानवता है ?

पता है तुम्हें कि कितने बहरुपिये तुम्हें धोखा दे रहे हैं ? वो लोग तुम्हारे सीने पर बहने वाली पवित्र गंगा में स्नान करते हैं..तुमको महान कहते हैं...फिर अपने काले कारनामों से तुम्हें बदनाम करते हैं..तुम्हें महान कहकर तुम्हारी चापलूसी करके तुम्हारी दशा बिगाड़ रहे हैं...तुम्हारे अपने बच्चे आपस में फूट डाले हुये हैं..आपस में सहनशक्ति नहीं है फिर भी सबको झूठी दिलासा देते हैं..ये सहकर तुम्हें कैसा लगता होगा. और तुम्हें तो पता है कि जो धरती पे सोना उगाने वाले हैं उनका क्या अंजाम हो रहा है. लेकिन तुम तो चुप हो..मौन हो सब सहते हुये. क्योंकि तुम्हारे रूप को सजाने और सुधारने वाले तुम्हारे बच्चे एक दूसरे का गला काटने को तैयार हैं. तुम्हारी आँखों के तले कितने अन्याय हो रहे हैं, कितना भ्रष्टाचार और कुरीतियाँ पनपे जा रही हैं. एकता की बात करने वाले खुद ही एक दूसरे को सीधी आँख से देख नहीं सकते. जलन, आलोचना करने वाले और दूसरों को सहारा न देकर उसकी मजबूरियों का फायदा उठाने वाले लोग जब इसके नारे लगाते हैं देश पर राज करने के लिये तो मन में बहुत रोष भर जाता है. पता नहीं कितने ताकत वाले कितनों की जान ले रहे हैं और कितने ही गरीब और निसहाय अपनी जान दे रहे हैं. अरे देखो बात करते-करते आज फिर जम्हाइयाँ आनी शुरू हो गयी हैं...लगता है कि अब गुड नाइट कहने का समय आ गया है..आज दिन में मैं बाहर भी गयी थी कुछ घंटों को तो थकान भी बहुत हो रही है...पर फिर भी तुमसे बात किये बिना न रह सकी. अब आज अगली बार का वादा नहीं कर रही हूँ..पर बातें तो अभी भी बहुत करनी हैं...चलो तो फिर तुमको गुड नाइट और स्वीट ड्रीम्स...काश तुम्हारे ड्रीम्स पूरे हो सकें....

तुम्हारे अतीत से बिछुड़ी एक कड़ी

- मैं


तेरी याद अब भी आती है - भाग 1

तेरी याद मुझे अक्सर आती है

खाली लम्हों में मुझे सताती है.

प्रिय भारत,

कैसे हो ? आज अचानक दिमाग में पता नहीं क्यों कुछ उचंग उठी और तुम्हे पत्र लिखने को जी चाहा जो अब लिख रही हूँ. तुम्हें तो शायद मेरी याद तक न होगी..क्योंकि तुम्हारे पास तो पता नहीं कितने लोग हैं उनमें ध्यान बंटा रहता होगा. सुना है कि आजकल तुम बहुत उदास और परेशान रहते हो...और मैं अक्सर यह सोचती हूँ कि तुमसे मिले और तुम्हें देखे हुये बहुत समय हो गया है..कभी-कभी तो तुम्हारी बहुत याद आती है. कई बार ऐसे ही खाली पलों में या कभी कहीं आते-जाते भी तुम्हारी याद आ जाती है. कुछ भी हो मैं तुम्हें वेवफा नहीं कहती..क्यूँ कि...

न हम वेवफा थे न तुम वेवफा थे

यूँ कहो हमारे सितारे कुछ खफा थे.

ये हमारी मजबूरियत थी..किस्मत में हमारा बिछड़ना ही लिखा था. लेकिन जब-जब तुम्हारा अहसास होता है..तो आँखें बंद करके उन मीठी यादों में डूब जाती हूँ. तुम्हारे संग बिताये वो साल और उन सालों के सुखद-दुखद पल याद आते रहते हैं..और इतने साल होने के वावजूद भी तुम अब भी मेरी यादों में रहते हो...तो मैं वेवफा कैसे हो सकती हूँ..तुममें अब भी अपनापन ढूँढती हूँ. हाँ, तुम मुझे मूरख कह सकते हो, नादान कह सकते हो..पर क्या करूँ तुमसे अपनेपन का अहसास कभी गया ही नहीं...अब भी मोह जाल में फँसी हूँ कि अगर तुम्हारे पास होती तो कैसा लगता मुझे...इस तरह की बातें अक्सर चक्कर काटती रहती हैं अपुन के भेजे में. खैर, अभी तो ढेर सारी बातें और करनी हैं तुमसे..लेकिन ये काया आपे में नहीं है..इस समय बहुत जोरों की नींद आ रही है..दिमाग सुन्न होने लगा है..इसलिये बुरा ना मानना. कल तुमसे फिर बातें करूँगी शायद इसी समय. तो अब गुड नाइट..स्वीट ड्रीम्स..लेकिन मीठे सपनों से क्या होगा..वो तो सपने ही रहते हैं.

तुम्हारे अतीत की एक कड़ी

- मैं


एक भारतीय महिला को कैसा होना चाहिये ?

कहीं पर मैंने किसी पुरुष का लिखा पढ़ा '' भारतीय महिला को माडर्न बनना चाहिये किन्तु उसे किसी बिदेशी औरत की नकल नहीं करनी चाहिये.''


तो ये भई कौन सी और किस तरह की बात हुयी ? ये तो कोई पुरुष एक आर्डर सा दे रहा है भारतीय औरत को माडर्न बनने का. लेकिन साथ में उसकी लगाम भी खींच रहा है. है ना ? क्या इसी तरह से एक स्त्री भी भारतीय पुरुषों को हुकुम दे सकती है या उनसे अपेक्षा कर सकती है कि उन्हें क्या बनना चाहिये और क्या नहीं..और किस हद तक अपने को बदलना चाहिये..पुरुष तो अपने को बेलगाम ही पसंद करते हैं..सही है ना ? खुद को भारतीय कहने वाले पुरुष ( बिदेशों में रहने वाले भारतीयों को तो छोड़ो ) भारत में ही कौन सा धोती और गमछा में रहते हैं..सभी तो पैंट, शर्ट या टी-शर्ट और शोर्ट में दिखते हैं. खाना पीना, बोलना मनोरंजन और फैशन..क्या छोड़ा है जिसमें बदले नहीं..औरतों से अधिक तो पुरुष प्रदर्शन करते हैं बिदेशीपन की. आहाहा ! दाढ़ी और हेयर स्टाइल का क्या कहना..सर में तेल की जगह कभी GEL लगाकर बाल खड़े हैं, कभी मोहिकन कट, कभी गोटीकट और कभी बस ऊपर ही छत पर बाल और इधर-उधर से सफाचट..आदमियों के लिये मार्केट में तरह-तरह के बिदेशी शैम्पू और परफ्यूम..माडर्नपने की और क्रेजी होने की कोई सीमा भी है. कानों में बाली-बुँदे और नाक तक में कई लोग कील पहनते हैं, मुकाबले में किसी बात से कम नहीं हैं..और औरतों पर बंदिश ! कोई कितना माडर्न बनना चाहता है या नहीं ये उस पर ही छोड़ देना चाहिये.


मन में किरकिराहट सी होती है सोचकर कि सारा प्रेशर एक औरत पर ही क्यों डाला जाता है कि उसे कैसा बनना चाहिये और कैसा नहीं..क्या माडर्न बनने की छूट देने पर उसका कोई मापदंड होता है..फिर तो वो औरत परिस्थितिओं के चंगुल में फँसकर उसके बहाव में बह जायेगी..उसे अपने आप भी तो कुछ सोचने का मौका मिलना चाहिये..कई बार माडर्न सोसाइटी में मिलने-जुलने पर किसी औरत के बाल कटे होते हैं, किसी के लंबे..कोई साड़ी में, कोई शलवार-कमीज में तो कोई स्कर्ट में दिखेगी..कोई कम मेकअप, कोई कुछ अधिक किये हुये और कोई बिना किसी मेकअप के..लेकिन कई बार वो अपनी सहेलियों के साथ जैसा होगा उसका भी अनुसरण अपनी मर्जी से करती है..या उसका साथ देकर उसे खुश करने में भी करती है. इसी तरह सामाजिक अवसरों पर कोई जरूरी नहीं कि किसी शराब पीने वाले आदमी का साथ शराब पीकर ही दूसरे आदमी को देना पड़े. क्या जरूरी है कि नकलची बना जाये ? चाहें उसके बाद सेहत बिगड़ जाये और जाकर उलटी कर दे..और ये भी जरूरी नहीं कि पति शराब पीता हो तो उसकी औरत भी पीने लगे वरना वो माडर्न नहीं रहेगी.


ये माडर्न होना क्या होता है ? खाली खाना-पहनावा ही तो नहीं...क्योंकि होने को तो बहुत कुछ हो रहा है भारतीय समाज में बिदेशियों की नकल करके. तो किस-किस माडर्न चीज पर बंदिश होनी चाहिये ? आखिरकार कोई तो लिस्ट बनाये. पहनावा की बातें अपनी इच्छानुकूल भी अपनी भावनाओं पर निर्भर करती हैं. और कभी-कभी हर किसी की परिस्थितियाँ भी होती हैं. और ये भी कोई जरूरी नहीं कि एक औरत दूसरों को खुश करने के लिये अपनी इच्छा के विपरीत पहनावे में माडर्न बने. लोगों के लिये नुमाइश बनने से तो अच्छा है कि अगर सस्ता कपड़ा भी सलीके से पहना जाये तो इंसान अपनी आंतरिक खुशी में तो जी सकता है..सारी दुनिया को तो खुश करने के लिये ही तो नहीं जिया जाता हमेशा..कुछ अपनी भी चाहत और खुशियाँ होती हैं..चाहें वो पहनावा हो या कुछ और. हम कई बार परिस्थितिओं को भी चुनौती देकर अपने तरीके से और सलीके से जी सकते हैं. समाज में तो जितने मुँह, उतनी बातें होती हैं..एक ही ड्रेस की कोई इंसान तारीफ़ करेगा तो दूसरा मुँह दबा कर हँसेगा..किस-किस की परवाह की जाये...Just be yourself.